राकेश नाथ
नई दिल्ली। इंडियन नेशनल टीचर्स’ कांग्रेस (इंटेक) ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को समाप्त कर उसके स्थान पर हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (एचईसीआई) लाने और उच्च शिक्षा के वित्तपोषण को हायर एजुकेशन फंडिंग एजेंसी (हैफा) को सौंपने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव पर गंभीर चिंता जताई है। इंटेक के अनुसार यह कदम गुणवत्ता सुधार नहीं, बल्कि भारतीय सार्वजनिक उच्च शिक्षा प्रणाली पर सीधा आक्रमण है। इंटेक के अध्यक्ष प्रो पंकज गर्ग का कहना है कि 2018 के मसौदा एचईसीआई विधेयक में विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को सार्वजनिक अनुदान देने का कोई प्रावधान नहीं है। यूजीसी की अनुदान-आधारित व्यवस्था को समाप्त कर एक ऐसे नियामक निकाय की स्थापना की जा रही है, जिसके पास दंडात्मक शक्तियाँ तो होंगी, लेकिन वित्तीय जिम्मेदारी नहीं होगी।
हैफा का ऋण-आधारित मॉडल विवादों में
संस्था का आरोप है कि हैफा के माध्यम से उच्च शिक्षा को ऋण-आधारित वित्तपोषण की ओर धकेला जा रहा है। इससे विश्वविद्यालयों को अवसंरचना और शोध के लिए कर्ज लेना पड़ेगा और तय समय में उसे चुकाने का दबाव रहेगा, जिससे शिक्षा का व्यवसायीकरण बढ़ेगा।

गरीब और वंचित वर्गों पर सबसे अधिक असर
इंटेक लीडर प्रो पंकज गर्ग के अनुसार इस बदलाव से उच्च शिक्षा आम जनता की पहुँच से बाहर हो जाएगी। विशेष रूप से ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के छात्रों पर इसका गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जो सार्वजनिक विश्वविद्यालयों पर निर्भर हैं। इसे संविधान में निहित समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन बताया गया है।
स्वायत्तता नहीं, निजीकरण थोपा जा रहा
इंटेक का कहना है कि बिना अनुदान वाला वित्तपोषण स्वायत्तता नहीं, बल्कि जबरन निजीकरण है। इसके चलते विश्वविद्यालयों को फीस बढ़ाने, स्वयं-वित्तपोषित पाठ्यक्रम शुरू करने और गैर-लाभकारी विषयों को कमजोर करने के लिए मजबूर किया जाएगा।
अत्यधिक केंद्रीकरण पर चिंता
मसौदा विधेयक के तहत एचईसीआई को शिक्षण मानकों, फीस ढांचे, संस्थागत दर्जे और शिक्षकों व कुलपतियों की पात्रता तय करने की व्यापक शक्तियाँ दी गई हैं। साथ ही, आयोग को केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा, जिससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता समाप्त होने का खतरा है।
संस्थानों को बंद करने तक की शक्ति
इंटेक ने चेताया कि प्रस्तावित कानून के तहत एचईसीआई को ‘गैर-अनुपालन’ के आधार पर संस्थानों की मान्यता रद्द करने और उन्हें बंद करने का अधिकार मिलेगा। इतना ही नहीं, संस्थागत प्रमुखों के खिलाफ दंडात्मक प्रावधानों को शैक्षणिक प्रशासन का अपराधीकरण बताया गया है।
संयुक्त प्रभाव: दमनकारी ढांचा
इंटेक के अनुसार एचईसीआई और हैफा मिलकर ऐसा तंत्र बनाएंगे, जिसमें
- * सार्वजनिक अनुदान समाप्त होंगे,
- * विश्वविद्यालयों को राजस्व-आधारित मॉडल अपनाने को मजबूर किया जाएगा,
- * कड़े नियामक नियम लागू होंगे,
- * और अंततः कमजोर संस्थानों का विलय या निजीकरण होगा।
इंटेक की सरकार से मांगें क्या क्या हैं
- * यूजीसी को समाप्त कर एचईसीआई लागू करने की योजना तत्काल वापस ली जाए।
- * यूजीसी की सार्वजनिक अनुदान आधारित वित्तपोषण व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
- * संघीय ढांचे की रक्षा करते हुए राज्यों की समान भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
- * हैफा के ऋण-आधारित मॉडल को खत्म कर सार्वजनिक वित्तपोषण बढ़ाया जाए।
- * शैक्षणिक स्वतंत्रता, संस्थागत स्वायत्तता और सामाजिक न्याय की रक्षा की जाए।
जनभागीदारी की अपील
इंटेक ने देशभर के शिक्षकों, छात्रों, शोधकर्ताओं और नागरिकों से अपील की है कि वे इस संकट को समझें और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों व लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था की रक्षा के लिए एकजुट हों। संस्था ने दो टूक कहा कि भारतीय उच्च शिक्षा न तो बाजार की संपत्ति है और न ही निजी कॉरपोरेशनों की, बल्कि यह देश की जनता की है।
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