नई दिल्ली: तिरंगा केवल तीन रंगों का कपड़ा नहीं है। वह देश की स्वतंत्रता, संविधान, राष्ट्रीय एकता और करोड़ों भारतीयों के बलिदान का प्रतीक है। इसलिए जब कोई राजनीतिक दल तिरंगा लेकर सड़कों पर उतरता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसके पीछे राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना है, किसी मुद्दे पर जनजागरण का उद्देश्य है या राजनीतिक संदेश देने की रणनीति। किसी भी तिरंगा मार्च का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसमें कितने झंडे थे, कितने लोग शामिल हुए या तस्वीरें कितनी प्रभावशाली दिखाई दीं। असली सवाल यह है कि तिरंगा उठाने वालों के विचार, व्यवहार और सार्वजनिक कार्यों में राष्ट्रहित कितना दिखाई देता है।
काकरोच पार्टी व आम आदमी पार्टी तिरंगा मार्च यदि वास्तव में तिरंगे के प्रति सम्मान व देश के प्रति सम्मान के लिये था तो निश्चित रूप से यह स्वागत योग्य है लेकिन यदि राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल केवल राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिये किया जा रहा है तो सवाल उठने जायज है। सच्ची देशभक्ति का अर्थ केवल झंडा फहराना या विरोध प्रदर्शन में तिरंगा लहराना नहीं है। देशभक्ति का संबंध नागरिकों के अधिकारों, कर्तव्यों, संविधान और देश की संस्थाओं के प्रति जिम्मेदारी से भी है।
काकरोच जनता पार्टी के अध्यक्ष अभिजीत दिपके अपने तिरंगा मार्च को तिरंगा फहराने के अधिकार व नागरिक स्वतंत्रता से जोड़ रहे हैं लेकिन क्या सच में वह तिरंगे के प्रति प्यार दर्शाने के लिये तिरंगा मार्च कर रहे थे या फिर मीडिया में अपनी उपस्थिति बनाने व राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल जनसमर्थन जुटाने में कर रहे थे। तिरंगा मार्च के पीछे काकरोच पार्टी की मंशा क्या थी यह तो अभिजीत दिपके व उनकी टीम ही बता सकती है लेकिन केवल जनसमर्थन जुटाने के लिये राष्ट्रध्वज का इस्तेमाल करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।
यहां सवाल किसी की राष्ट्रभक्ति को खारिज करने का नहीं है, सवाल केवल राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिये किये जाने का है। जिस सेंट्रल पार्क में काकरोच पार्टी ने तिरंगा मार्च का आह्वान किया था उसी सेंट्रल पार्क में लगभग 200 फुट से ऊंचा विशाल तिरंगा काफी पहले से हमेशा फहराता दिखाई देता है, क्या काकरोच पार्टी व आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता कभी भी इस विशाल तिरंगे के प्रति अपना सम्मान दिखाने गये है और क्या केवल तिरंगा मार्च से ही तिरंगे के प्रति सम्मान दिखाया जा सकता है।
तिरंगा हमारे देश का सम्मान है व देश की साझा पहचान है। तिरंगे के सम्मान का वास्तविक अर्थ यह है कि तिरंगे के नीचे खड़ा व्यक्ति हो या फिर तिरंगा मार्च करने वाला एक-एक व्यक्ति चाहे वह सत्ता में हो या विपक्ष में हो वह संविधान, नागरिकों के अधिकार और राष्ट्रहित के प्रति समान रूप से जवाबदेह हो। तिरंगे का सम्मान व देशभक्ति का प्रमाण राजनीतिक नारों में नहीं बल्कि विचारों की ईमानदारी और आचरण में जिम्मेदारी में है। एक गंभीर सवाल उन लाखों लोगों की रोजी-रोटी को लेकर भी है जिनकी रोजी-रोटी सुरक्षा कारणों से प्रभावित हो रही है, तिरंगे के सम्मान का दावा करने वालों की जवाबदेही क्या उन लोगों के प्रति नहीं है जिनकी रोजी-रोटी पर उनके प्रदर्शनों से गंभीर असर पड़ रहा है।
लोकतंत्र में सरकार से असहमति जताना और प्रदर्शन करना पूरी तरह उचित है और सरकार की मनमानी पर अंकुश लगाने के लिये यह जरूरी भी है लेकिन असहमति व प्रदर्शन के नाम पर अराजकता का माहौल बनाना कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। देश में इससे पहले भी राजनीतिक दल समय-समय पर राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रवाद और देशभक्ति को अपने सार्वजनिक अभियानों का हिस्सा बनाते रहे हैं। तिरंगा किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं है। सत्ता पक्ष, विपक्ष, सामाजिक संगठन और आम नागरिक—सभी उसके प्रति सम्मान व्यक्त कर सकते हैं। सरकार की आलोचना करना अपने आप में देश की आलोचना नहीं है उसी तरह सरकार का समर्थन करना किसी व्यक्ति की देशभक्ति का प्रमाण नहीं है। लेकिन यदि कोई हाथ में तिरंगा लेकर चलता है तो उसकी जिम्मेदारी संविधान के प्रति भी होनी चाहिये।
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