- * संसदीय समिति के निर्देशों की अवहेलना कर निकाले जा रहे हैं प्रिंसिपल पदों के विज्ञापन
- * संसदीय समिति ने दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रिंसिपल के पदों में आरक्षण लागू करने का निर्देश दिया था
नई दिल्ली। फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस के चेयरमैन डॉ.हंसराज सुमन ने बताया है कि लोकसभा में दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में अनुसूचित जाति श्रेणी ( एससी ) के कितने प्रधानाचार्य है और कितना प्रतिनिधित्व दिया गया है । संसद में यह सवाल एक सांसद द्वारा उठाया गया । उन्होंने बताया है कि 19 दिसम्बर 2022 को लोकसभा में सांसद डॉ.डी. रविकुमार ने दिल्ली विश्वविद्यालय के महाविद्यालयों में अनुसूचित जाति (अ.जा ) श्रेणी से जुड़े प्रधानाचार्यो की संख्या कितनी है, सवाल पूछा इसके अलावा , उक्त प्रधानाचार्यो का प्रतिनिधित्व कम है तो तत्संबंधी ब्यौरा क्या है और इसके क्या कारण है ।
लोकसभा के अतारांकित प्रश्न संख्या --2034 के उत्तर में जवाब देते हुए कहा है कि प्रधानाचार्य का पद सिंगल कैडर पोस्ट है बताया गया है । दिल्ली विश्वविद्यालय के महाविद्यालययों में प्रधानाचार्यो की नियुक्ति यूजीसी विनियम , 2018 में निर्धारित मानदंडों के अनुसार की जाती है। साथ ही केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान ( शिक्षक वर्ग में आरक्षण ) अधिनियम , 2019 दिनांक , 9/7/2019 को अधिसूचित किया गया है ताकि विश्वविद्यालय को एक इकाई मानकर रोस्टर तैयार करना सुनिश्चित किया जा सके । फोरम के चेयरमैन डॉ. हंसराज सुमन का कहना है कि संसद में दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में अनुसूचित जाति के समुदाय से जुड़े प्रधानाचार्य के संदर्भ में दी गई जानकारी के उत्तर से संतुष्ट नहीं है । उन्होंने बताया है कि डीयू में 79 कॉलेज है और उनकी नियुक्ति विश्वविद्यालय प्रशासन के माध्यम से की जाती है । उन्होंने सांसद द्वारा सवाल उठाने पर खुशी जाहिर की है लेकिन उन्हें जो जवाब दिया है उससे संतुष्ट नहीं है ।उन्होंने बताया है कि प्रोफेसर व प्रिंसिपल पदों में आरक्षण दिए जाने को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय में 9 जुलाई 2015 को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग , यूजीसी , डीओपीटी , शिक्षा मंत्रालय व एससी /एसटी के कल्याणार्थ संसदीय समिति यहाँ आरक्षण का मुआयना करने आई थीं । संसदीय समिति ने 18 दिसम्बर 2015 को एक रिपोर्ट लोकसभा में प्रस्तुत की जिसमें कहा गया था कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों के प्रिंसिपल पदों को क्लब करके रोस्टर रजिस्टर बनाया जाए । उनका कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रिंसिपल पदों का रोस्टर रजिस्टर आज तक तैयार नहीं किया । उन्होंने बताया है कि वर्तमान में --79 कॉलेज है । इनमें से किसी भी कॉलेज में एससी /एसटी व ओबीसी कोटे से प्रिंसिपल नहीं है ।
डॉ.सुमन ने बताया है कि यदि संसदीय समिति की रिपोर्ट को दिल्ली विश्वविद्यालय में सही से लागू किया जाता तो वर्तमान में इन वर्गों के एससी --12 , एसटी ---06 , ओबीसी --20 , पीडब्ल्यूडी --4 पद प्रिंसिपल के होते । लेकिन अभी भी प्रिंसिपल पदों को अनारक्षित ही निकाल रहे है । उनका यह भी कहना है कि संसदीय समिति की रिपोर्ट को बने 7 साल हो चुके है मगर उसे आज तक न ही लागू किया और न ही प्रिंसीपल पदों का रोस्टर रजिस्टर ही बनाया जिससे ये पद आरक्षित वर्गों से भरे जा सके । उन्होंने यह भी बताया है कि अकेले दिल्ली सरकार से वित्त पोषित 28 कॉलेजों में से 20 कॉलेजों में प्रिंसिपल पदों पर स्थायी नियुक्ति की जानी है । उन्होंने बताया है कि दिल्ली सरकार के कॉलेजों में आरक्षण लागू होता है तोइन कॉलेजों में आरक्षित वर्ग के प्रिंसिपल बनेंगे --- मोतीलाल नेहरू कॉलेज , सत्यवती सह-शिक्षा कॉलेज , राजधानी कॉलेज , शिवाजी कॉलेज , श्री अरबिंदो कॉलेज , विवेकानंद कॉलेज , डॉ.अम्बेडकर कॉलेज , दीनदयाल उपाध्याय कॉलेज आदि कॉलेजों के पद आरक्षित श्रेणी के शिक्षकों के बनते । डीयू प्रशासन इन्हें सामान्य श्रेणी के शिक्षकों से भरना चाहता है।
उन्होंने बताया है कि दिल्ली सरकार से सम्बद्ध 20 से अधिक कॉलेजों में लंबे समय से प्रिंसिपल के पदों पर नियुक्तियांँ ना होने से बहुत से कॉलेजों में अस्थायी प्रिंसिपल हैं। इन पदों पर आरक्षण देते हुए यथाशीघ्र स्थाई नियुक्ति करने कीं मांग काफी अर्से से फोरम द्वारा की जा रही है। इनमें ज्यादातर दिल्ली सरकार के कॉलेज हैं । उन्होंने बताया है कि दिल्ली सरकार के अंतर्गत वित्त पोषित 28 कॉलेज आते हैं, इनमें 20 से अधिक ऐसे कॉलेज है जो अस्थायी रूप से या ओएसडी प्रिंसिपलों के सहारे चल रहे हैं । उनका कहना है कि कुछ समय पहले विभिन्न कॉलेजों के स्थायी प्रिंसिपलों के पदों के विज्ञापन निकाले गए थे, इनमें से हाल ही में भगतसिंह कॉलेज में परमानेंट प्रिंसिपलों की नियुक्ति की गई । उसके बाद नियुक्ति की प्रक्रिया अभी जारी है , साथ ही कुछ कॉलेजों की स्क्रीनिंग का कार्य जोरों पर चल रहा है । उनका कहना है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन आरक्षण प्रावधानों को लागू किए बिना प्रिंसिपल के पदों को भर लेगा तो उन्हें आरक्षण कब दिया जाएगा ? इस अनियमितता से आरक्षित वर्ग के शिक्षकों में असंतोष व्याप्त है और विश्वविद्यालय प्रशासन को उनके आक्रोश का सामना करना पड़ेगा।
उनका यह भी कहना है कि किसी भी कॉलेज या संस्थान में प्रिंसिपल एक महत्वपूर्ण प्रशासकीय पद होता है। काॅलेज और संस्थान को प्रिंसिपल ही सबसे अधिक समय देता है । विश्वविद्यालय में प्रोफेसर व प्रिंसिपल एक बराबर रैंक माने जाते हैं । जब प्रोफ़ेसर में आरक्षण दिया जा रहा है तो प्रिंसिपल के पदों पर आरक्षण के प्रावधान क्यों नहीं लागू किए जा रहे हैं ? उनका कहना है कि जो जवाब संसद में दिया है फोरम उसको लेकर संसदीय समिति में जायेगा । उनका कहना है कि संसदीय समिति की रिपोर्ट को बिना देखें जवाब दिया है ।
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