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बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन ने नालंदा विश्वविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का उद्घाटन किया।
नालंदा: नालंदा विश्वविद्यालय के विश्वमित्रालय ऑडिटोरियम में ‘विकसित भारत के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का उद्घाटन बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन ने किया।
परिसंवाद के उद्घाटन सत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता, शिक्षा और अनुसंधान में इसके समावेशन तथा विकसित भारत के निर्माण में इसकी भूमिका पर विचार-विमर्श किया गया।
विकसित भारत के लिए ज्ञान और नए विचारों पर जोर
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन ने कहा कि विकसित भारत की पहचान केवल आर्थिक समृद्धि और शक्ति से नहीं होगी, बल्कि ज्ञान के सृजन, नए विचारों और मानवता के लिए समाधान प्रस्तुत करने की क्षमता से भी होगी।
उन्होंने कहा कि भारत को फिर ऐसा राष्ट्र बनना चाहिए जहां दुनिया विचारों के लिए आए।
भारतीय ज्ञान परंपरा को विभिन्न ज्ञान-विधाओं से जोड़ने पर जोर
नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को अलग खांचे में रखने के बजाय विभिन्न ज्ञान-विधाओं के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने प्रमाण-आधारित अध्ययन के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला।
वैश्विक चुनौतियों के समाधान में भारतीय ज्ञान की भूमिका
डॉ. अतुल कोठारी ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा आज की वैश्विक चुनौतियों के समाधान और विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
प्राचीन ज्ञान को नवाचार का स्रोत बनाने पर चर्चा
प्रोफेसर भूषण पटवर्धन ने भारतीय ज्ञान को संवाद और निरंतरता के साथ समझने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने प्राचीन ज्ञान को नवाचार के स्रोत के रूप में देखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करने पर जोर
प्रोफेसर रमेश भारद्वाज ने भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
उन्होंने इसके प्रामाणिक पाठ्य और पुरातात्विक साक्ष्यों को सामने लाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
परिसंवाद में प्रमुख विषय
दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद के उद्घाटन सत्र में मुख्य रूप से निम्न विषयों पर विचार सामने आए:
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विकसित भारत के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका
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भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता
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विभिन्न ज्ञान-विधाओं के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा का समन्वय
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प्रमाण-आधारित अध्ययन और अनुसंधान
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प्राचीन ज्ञान और आधुनिक नवाचार
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शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश
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प्रामाणिक पाठ्य और पुरातात्विक साक्ष्यों का अध्ययन
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वैश्विक चुनौतियों के समाधान में भारतीय ज्ञान की संभावित भूमिका
प्रमुख वक्ताओं के विचार
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सैय्यद अता हसनैन: विकसित भारत को ज्ञान सृजन और नए विचारों की क्षमता से भी परिभाषित किए जाने पर जोर।
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प्रो. सचिन चतुर्वेदी: भारतीय ज्ञान परंपरा को विभिन्न ज्ञान-विधाओं से जोड़ने और प्रमाण-आधारित अध्ययन की आवश्यकता पर बल।
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डॉ. अतुल कोठारी: वैश्विक चुनौतियों और विकसित भारत के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता पर जोर।
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प्रो. भूषण पटवर्धन: प्राचीन ज्ञान को नवाचार के स्रोत के रूप में देखने की आवश्यकता पर प्रकाश।
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प्रो. रमेश भारद्वाज: शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करने तथा प्रामाणिक पाठ्य और पुरातात्विक साक्ष्यों के अध्ययन की आवश्यकता पर जोर।
FAQs
नालंदा विश्वविद्यालय में किस विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित किया गया?
नालंदा विश्वविद्यालय में ‘विकसित भारत के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित किया गया।
परिसंवाद का उद्घाटन किसने किया?
बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन ने परिसंवाद का उद्घाटन किया।
कार्यक्रम का आयोजन कहां हुआ?
कार्यक्रम नालंदा विश्वविद्यालय के विश्वमित्रालय ऑडिटोरियम में आयोजित किया गया।
सैय्यद अता हसनैन ने भारतीय ज्ञान परंपरा के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि विकसित भारत केवल आर्थिक समृद्धि और शक्ति से नहीं, बल्कि ज्ञान के सृजन, नए विचारों और मानवता के लिए समाधान प्रस्तुत करने की क्षमता से भी परिभाषित होगा।
प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने किस बात पर जोर दिया?
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को विभिन्न ज्ञान-विधाओं के साथ जोड़ने और प्रमाण-आधारित अध्ययन के माध्यम से आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
डॉ. अतुल कोठारी ने क्या कहा?
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह वैश्विक चुनौतियों के समाधान और विकसित भारत के निर्माण में योगदान दे सकती है।
प्रोफेसर भूषण पटवर्धन ने किस विषय पर जोर दिया?
उन्होंने भारतीय ज्ञान को संवाद और निरंतरता के साथ समझने तथा प्राचीन ज्ञान को नवाचार के स्रोत के रूप में देखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
प्रोफेसर रमेश भारद्वाज ने क्या कहा?
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में पुनर्स्थापित करने और उसके प्रामाणिक पाठ्य तथा पुरातात्विक साक्ष्यों को सामने लाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
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