- * प्रोबेशन काल पूरा होने पर शिक्षकों की होने लगी प्रमोशन,
- * सीनियरिटी लिस्ट को कॉलेज अपनी वेबसाइट पर अपलोड करें ।
नई दिल्ली । दिल्ली विश्वविद्यालय के विभागों व उससे संबद्ध कॉलेजों में हुई सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति के बाद जिन शिक्षकों का प्रोबेशन काल पूरा हो गया वे अपने -अपने कॉलेजों में अपने वरिष्ठता क्रम को लेकर सवाल उठाने लगे हैं। हालांकि शिक्षकों के वरिष्ठता क्रम को लेकर वाइस चांसलर के निर्देश पर कुलसचिव ने एक समिति गठित की थी। डीन ऑफ कॉलेजिज को इस समिति का चेयरपर्सन बनाया गया था। इसके अतिरिक्त पाँच अन्य सदस्यों को भी इस समिति में रखा गया था। समिति ने अपनी रिपोर्ट 31 जुलाई 2024 तक विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंपनी थी। लेकिन समिति ने अभी तक शिक्षकों के वरिष्ठता क्रम को लेकर अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपी है। वहीं दूसरी ओर जिन शिक्षकों का प्रोबेशन काल पूरा हो रहा है उनका प्रमोशन भी किया जा रहा है, परन्तु केंद्र सरकार व डीओपीटी के नियमानुसार एससी/एसटी व ओबीसी के शिक्षकों को जहाँ बैकलॉग व शार्टफाल के पदों को भरने के बाद वरिष्ठता क्रम में सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए था, इस नियम को कॉलेज प्रशासन नहीं मान रहे हैं और आरक्षित वर्ग के शिक्षकों को वरिष्ठता क्रम में नीचे रख कर जूनियर बना रहे हैं।
अधिकांश कॉलेज डीओपीटी और केन्द्र सरकार के नियमों की अवहेलना कर वरिष्ठता की सूची बना रहे हैं । फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस ने दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह से मांग की है कि वह केंद्र सरकार व डीओपीटी के नियमों का पालन करते हुए शिक्षकों की वरिष्ठता सूची तैयार कर जल्द से जल्द कॉलेजों के प्रिंसिपलों को सर्कुलर जारी करे । फोरम की मांग है कि सीनियरिटी को लेकर बनी कमेटी की रिपोर्ट को भी सार्वजनिक किया जाए । सीनियरिटी लिस्ट को कॉलेज अपनी वेबसाइट पर अपलोड करें ताकि सभी शिक्षकों की जानकारी उपलब्ध हो सके ।
फोरम के चेयरमैन डॉ. हंसराज सुमन ने बताया है कि जब भी वरीयता क्रम की सूची तैयार की जाती है तो यह देखा जाता है कि रोस्टर में यह पद किस वर्ष आया तथा उक्त पद बैकलॉग का है या शॉटफाल है, क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय में एक दशक बाद सहायक प्रोफेसर के स्थायी पदों पर नियुक्ति हुई है। इनमें एससी/एसटी व ओबीसी के ज्यादातर उन शिक्षकों की सहायक प्रोफेसर के पदों पर नियुक्ति हुई है जो पिछले एक दशक से एडहॉक शिक्षक के रूप में पढ़ा रहे थे। इनमें कुछ नियुक्तियाँ कॉलेजों के रोस्टर रजिस्टर में बैकलॉग पद आने पर विज्ञापित करके की गई हैं। विभिन्न विभागों और कॉलेजों में ये नियुक्तियाँ विश्वविद्यालय द्वारा बनाई गई चयन समिति (Selection committee) के माध्यम से की गई हैं। लेकिन चयन समिति ने मिनट्स बनाते समय भारत सरकार की आरक्षण नीति के अंतर्गत भर्ती नीति व कॉलेजों द्वारा बनाए गए रोस्टर के अंतर्गत श्रेणीवार चयनित अभ्यर्थियों का नाम नहीं रखा। परिणामस्वरूप कॉलेजों में सहायक प्रोफेसरों के वरिष्ठता क्रम (Seniority) को लेकर एकरूपता नहीं है। डॉ. सुमन का कहना है कि वरिष्ठता क्रम को लेकर कॉलेजों में वाद-विवाद खड़ा हो गया है। शिक्षकों में तनाव की स्थिति बन गई है। इसमें आरक्षित वर्ग के शिक्षकों के साथ अधिक भेदभाव किया जा रहा है। जूनियर शिक्षकों को वरीयता देकर वरिष्ठ बनाया जा रहा है। आरक्षित वर्गों के सहायक प्रोफेसरों के साथ हो रहे इस भेदभाव को लेकर फोरम ऑफ एकेडमिक फॉर सोशल जस्टिस ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, एससी/एसटी के कल्याणार्थ संसदीय समिति, शिक्षा मंत्रालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एवं विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखकर अनुरोध किया था तथा अनियमितता की जाँच कराने की मांग की थीं । इस अनियमितता को देखकर ही दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन ने समिति गठित की थी। लेकिन समिति ने अपनी रिपोर्ट अभी तक विश्वविद्यालय प्रशासन को नहीं सौंपी है। जिसको लेकर शिक्षकों में गहरा असंतोष व्याप्त है ।
डॉ. हंसराज सुमन ने बताया है कि कॉलेजों द्वारा सहायक प्रोफेसरों की नियुक्ति करते समय चयन समिति में बतौर सदस्य एससी/एसटी व ओबीसी के ऑब्जर्वर को चयन समिति के मिनट्स बनाते समय रोस्टर रजिस्टर देखना चाहिए था तथा बैकलॉग पदों की क्रमवार वास्तविक स्थिति देखनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया जिसके कारण वरिष्ठता क्रम के लिए यह समस्या पैदा हुई है। यदि एससी/एसटी के पदों का बैकलॉग था तो चयन समिति को मिनट्स बनाते समय नियमानुसार पहले एससी/एसटी के चयनित शिक्षकों को क्रम में रखना चाहिए था। उसके बाद तीसरे स्थान पर ओबीसी के चयनित सहायक प्रोफेसर को रखा जाता है। ज्ञात हो कि ओबीसी आरक्षण विश्वविद्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों एवं कॉलेजों में मार्च सन् 2007 से लागू हुआ था। कॉलेजों को पहले ट्रांच के इन पदों को सन् 2010 में भर लेना चाहिए था लेकिन इन पदों को नहीं भरने के कारण ओबीसी का बैकलॉग बढ़ता रहा। सन् 2010 के बाद अब जाकर इन पदों पर नियुक्ति की गई, इसलिए वरिष्ठता क्रम में उन्हें (ओबीसी) पहले रखा जाएगा। वरिष्ठता की सूची में भी उन्हें वरिष्ठ ही माना जाएगा। लेकिन कॉलेजों में चयन समिति ने मिनट्स बनाते समय नियमों की अनदेखी की और सामान्य वर्ग को वरिष्ठता क्रम में पहले रखा, उसके बाद ओबीसी, एससी, एसटी, पीडब्ल्यूडी व ईडब्ल्यूएस को क्रमवार सूची में रखा गया। जबकि होना यह चाहिए था जिन कॉलेजों में एससी/एसटी का बैकलॉग है वहाँ पहले एससी/एसटी वरिष्ठता में आएंगे। जहाँ ओबीसी का बैकलॉग है, यानि 2010 के बाद कॉलेजों ने पदों को विज्ञापित कर नियुक्ति की है वहाँ ओबीसी के सहायक प्रोफेसर को वरिष्ठतम माना जाएगा। उसके बाद एससी/एसटी, सामान्य वर्ग, पीडब्ल्यूडी व ईडब्ल्यूएस को रखा जाएगा। अब देखना यह है कि समिति किस तरह से सीनियरिटी लिस्ट बनाती है क्योंकि इसमें कोई भी सदस्य आरक्षित श्रेणी से नहीं है ।
डॉ. हंसराज सुमन ने यह भी बताया कि चयन समिति ने वरीयता देने में आरक्षित वर्गों के सहायक प्रोफेसरों के साथ घोर अन्याय किया है। उन्होंने आगे बताया है कि सहायक प्रोफेसर की चयन समिति ने मिनट्स बनाते समय पहले सामान्य वर्ग को रखा है उसके बाद ओबीसी फिर एससी/एसटी, पीडब्ल्यूडी व ईडब्ल्यूएस को क्रम में रखा है। जबकी डीओपीटी और केन्द्र सरकार के नियम के अनुसार यह गलत है । उनका कहना है कि केंद्र सरकार की आरक्षण नीति के अनुसार किसी भी चयन समिति को मिनट्स बनाते समय रोस्टर रजिस्टर व बैकलॉग पदों को चिन्हित कर पहले एससी/एसटी फिर ओबीसी के चयनित शिक्षकों को क्रमशः रखा जाता है, उसके बाद सामान्य वर्ग और अन्य श्रेणी के शिक्षकों को रखा जाता है। ओबीसी आरक्षण लागू होने के बाद उन पदों को समय पर नहीं भरा गया इसलिए उनके साथ भी न्याय किया जाए ।
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