डीयू के पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग का 80 वां स्थापना दिवस समारोह आयोजित
नई दिल्ली, 21 अप्रैल। : दिल्ली विश्वविद्यालय के पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग का 80 वां स्थापना दिवस समारोह मंगलवार, 21 अप्रैल को डीयू के वाइस रीगल लॉज स्थित कन्वेंशन हॉल में आयोजित हुआ। इस अवसर पर समारोह के मुख्य अतिथि के तौर पर मिजोरम के राज्यपाल जनरल डॉ. वी.के. सिंह उपस्थित रहे। समारोह की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने की। सेवानिवृत आई.ए.एस डॉ. अजय शंकर पांडेय समारोह के विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।
जनरल डॉ. वी.के. सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि जब आप किसी लाइब्रेरी में जाते हैं, तो वहाँ वो चीज प्राप्त करते हैं जो कहीं और नहीं मिल सकती। अगर आप यूरोप में जाएँ तो वहां सार्वजनिक पुस्तकालयों पर सबसे ज्यादा ज़ोर मिलता है। हमारे यहाँ भी पहले सार्वजनिक पुस्तकालय थे, धीरे धीरे उनका चलन खत्म होने लगा; कुछ जगह पर अभी भी हैं, लेकिन शायद उनकी देखरेख उतनी नहीं है, जितना कि उनको सपोर्ट मिलना चाहिए। अब समय है कि हम उन्हें और अच्छा बना सकें, ताकि सब लोगों को उनका फायदा मिल सके। उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि यूनिवर्सिटीज़ से ही देश के उच्चतम लोग निकल पाते हैं। डॉ. वी.के. सिंह ने कहा कि एक समय था जब लाइब्रेरी का अपना महत्व था। आप किसी भी संस्था का आकलन करना चाहते थे तो, उसकी लाइब्रेरी से उसका आकलन होता था। अब लाइब्रेरी का स्वरूप बदल गया है। लाइब्रेरी और इनफार्मेशन साइंस का अपना एक अलग महत्व है। किसी भी देश को आगे बढ़ने के लिए शिक्षा की जरूरत होती है। शिक्षा वह नींव देती है जिस पर राष्ट्र तरक्की करता है।
जितनी अच्छी शिक्षा होगी, उतना ही वो देश आगे जाएगा। उन्होंने कहा कि आजकल की नेटवर्क की दुनिया के अंदर इन्फॉर्मेशन साइंस और उस पर आधारित लाइब्रेरी का अलग ही महत्व है। कार्यक्रम के दौरान डॉ. वी.के. सिंह ने दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलगीत की सराहना करते हुए कहा कि कुलगीत बताता है कि संस्थान का आधार क्या है, वह आगे की प्रेरणा देता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डीयू कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि तकनीक के कारण आज लाइब्रेरी का स्वरूप बदल रहा है, लेकिन पुस्तकों की आवश्यकता कभी खत्म नहीं होगी। अगर हमें आगे बढ़ना है तो पढ़ने की आदत बनाए रखना जरूरी है। पुस्तकों का तरीका बदल सकता है, उनके प्रकाशन का माध्यम बदल सकता है, लेकिन उनकी उपयोगिता कम नहीं हो सकती। प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि प्राचीन काल में हमारे नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय विश्व प्रसिद्ध था। दुनिया के अनेकों देशों से स्कॉलर वहां पढ़ने आते थे। खिलजी ने उसे जलाने का काम किया। आखिर उसने उस ज्ञान के भंडार को ही क्यों जलाया? अगर इस देश पर आक्रमण करने वाले लाइब्रेरी को जला सकते हैं, तो समझिए ज्ञान की कितनी ताकत होती है। कुलपति ने कहा कि भारत में बीसवीं शताब्दी के आरंभ में सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना करने की शुरुआत का श्रेय बड़ौदा के महाराजा सियाजीराव को जाता है। उन्होंने अमरीका के विलियम एलनसन बोर्डेन को अपनी रियासत में पुस्तकालयों की स्थापना करने के लिए आमंत्रित किया। उस व्यक्ति ने राजी के बाहर बी भी पुस्तकों के लिए दान देने की प्रथा अपनाई। बीएचयू (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) की मुख्य लाइब्रेरी का नाम उन्हीं के नाम पर “सयाजीराव गायकवाड़ लाइब्रेरी” है, क्योंकि इसके निर्माण के लिए उन्होंने ही दान दिया था।
कार्यक्रम के आरंभ में डीयू के पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. केपी सिंह ने औपचारिक स्वागत भाषण के साथ विभाग के बारे में विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की। कार्यक्रम के समापन पर डीयू एसओएल की निदेशक प्रो. पायल मागो ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस अवसर पर पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग द्वारा अपने सम्मानित पूर्व छात्रों की असाधारण उपलब्धियों को सम्मानित करने हेतु “प्राइड एलुमनाई अवार्ड - 2026” की भी शुरुआत की गई। प्रो. केपी सिंह द्वारा लिखित पुस्तक “लाइब्रेरी इन्फॉर्मेशन साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च इन इंडिया” का विमोचन भी कार्यक्रम के दौरान किया गया। इस अवसर पर मिजोरम के राज्यपाल जनरल डॉ. वी.के. सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह, सेवानिवृत आई.ए.एस डॉ. अजय शंकर पांडेय, डीन ऑफ कॉलेजेज़ प्रो. बलराम पाणी, दक्षिणी परिसर की निदेशक प्रो. रजनी अब्बी, एसओएल की निदेशक प्रो. पायल मागो, रजिस्ट्रार डॉ विकास गुप्ता और प्रो. केपी सिंह सहित कई शीर्ष अधिकारी, शिक्षाविद और नौकरशाहों सहित भारी संख्या में विद्यार्थी भी उपस्थित रहे।
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