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दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के छात्रों ने भरतपुर में किया शैक्षणिक भ्रमण

भारतीय इतिहास में वैकल्पिक चेतना की खोज की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल

राकेश नाथ 

नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग द्वारा डॉ. सुरेंद्र कुमार के मार्गदर्शन में एमए इतिहास के विद्यार्थियों का शैक्षणिक भ्रमण राजस्थान के ऐतिहासिक नगर भरतपुर में आयोजित किया गया। इस यात्रा का उद्देश्य विद्यार्थियों को राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण, राज्य-व्यवस्थाओं के विकास तथा राजस्थान की वैचारिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय धरोहरों से प्रत्यक्ष रूप से परिचित कराना था।
 
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान: पर्यावरणीय इतिहास का जीवंत उदाहरण
 
भ्रमण की शुरुआत केवलादेव राष्ट्रीय उद्यानसे हुई, जो यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर स्थल है। 18वीं सदी में भरतपुर के शाही परिवार द्वारा विकसित यह क्षेत्र प्रारंभ में एक कृत्रिम जलाशय था, जिसे जल-प्रबंधन और शिकारगाह के रूप में उपयोग किया जाता था। समय के साथ यह विश्व के प्रमुख पक्षी-आश्रय स्थलों में शामिल हो गया। यहां विद्यार्थियों ने साइबेरिया, मध्य एशिया और अफ्रीका से आने वाले प्रवासी पक्षियों का अवलोकन किया तथा पर्यावरणीय इतिहास, पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और मानव–प्रकृति संबंधों पर सार्थक चर्चा की।
 
लोहागढ़ किला: किसान प्रतिरोध और सैन्य क्षमता का प्रतीक
 
इसके पश्चात विद्यार्थियों ने लोहागढ़ किले का भ्रमण किया, जिसे ‘अजेय किला’ कहा जाता है। 18वीं–19वीं सदी में भरतपुर के खेती से जुड़े समाजों द्वारा विकसित इस किले ने प्रतिरोध और नए राजत्व की अवधारणा को मजबूती दी। 1805 में अंग्रेज़ों द्वारा किए गए हमलों को विफल करने वाला यह किला औपनिवेशिक इतिहास में प्रतिरोध का सशक्त प्रतीक है। भ्रमण के दौरान विद्यार्थियों ने महाराजा सूरजमल के योगदान, किसान शक्ति के संगठन, प्रशासनिक व्यवस्था, कूटनीति तथा सैन्य रणनीतियों को गहराई से समझा।
 
भरतपुर म्यूजियम: क्षेत्रीय इतिहास और संस्कृति का दर्पण
 
अगले चरण में विद्यार्थियों ने भरतपुर म्यूजियम का अवलोकन किया। यहां संग्रहित मूर्तियाँ, शिलालेख, हथियार, हथकरघा और कला-सामग्री ने विद्यार्थियों को क्षेत्रीय कला, सामाजिक जीवन, आर्थिक तंत्र तथा शासक और उभरते हुए शासक समाज की संरचना को समझने का अवसर प्रदान किया।
 
छात्रों को शैक्षणिक उपलब्धि और अनुभव मिला
 
इस शैक्षणिक यात्रा के माध्यम से विद्यार्थियों को पर्यावरणीय इतिहास, मध्यकालीन उत्तर भारत के किसान प्रतिरोध, राज्य-व्यवस्था, सैन्य स्थापत्य और संग्रहालयीय स्रोतों के विश्लेषण का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ।
 
डीयू शिक्षकों के विचार
 
डॉ. सुरेंद्र कुमार (एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग) ने कहा कि इस प्रकार के भ्रमण सैद्धांतिक ज्ञान को ऐतिहासिक स्थलों से जोड़ने में अत्यंत सहायक होते हैं। विभागाध्यक्ष प्रो. अनिरुद्ध देशपांडे ने इस यात्रा की अनुमति प्रदान करते हुए कहा कि सामाजिक विज्ञान के अध्ययन के लिए ऐसी यात्राएं आवश्यक हैं, जो छात्रों को इतिहास और समाज को गहराई से समझने में मदद करती हैं।
 
आयोजन समिति को बधाई
 
इस शैक्षणिक भ्रमण को सफलतापूर्वक आयोजित करने के लिए आयोजन समिति के सदस्य लोकेश यादव, प्रियम झा, रोहित मोईरंगथम, मैरियट थेनंकाचन, सोनवीर चौधरी, शिवा पंवार, चेत्विक शर्मा सहित सभी विद्यार्थियों को बधाई दी गई।

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