नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध श्री अरबिंदो कॉलेज के छात्रों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत चार वर्षीय पाठ्यक्रम के अंतर्गत पढ़ाए जा रहे अस्मितामूलक हिंदी साहित्य पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। इसमें छात्रों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया व पाठ्यक्रम संबंधी प्रश्न पूछे । इस परिचर्चा में हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.हंसराज सुमन ने छात्रों को अपने संबोधन में दलित साहित्य के महत्व को बताते हुए उसके मानवीय मूल्यों एवं सांस्कृतिक समन्वय पर विस्तार से बात की। सांस्कृतिक समन्वय के विषय में बात करते हुए उन्होंने बताया कि ज्योतिबा फुले, डॉ. अम्बेडकर, कबीर व रैदास द्वारा लिखी गई साखी, शबद की प्रासंगिकता आज भी समाज में लोकप्रिय बनी हुई हैं। इन्हीं कारणों से मुझे लगता है कि अस्मितामूलक साहित्य दलित साहित्य के बीच से निकला हुआ साहित्य है। उन्होंने बताया कि वर्तमान दलित साहित्य में हमें समता, समानता, बंधुत्व, मैत्री और समरसता का भाव दिखाई देता है इसलिए दलित साहित्यकारों को चाहिए कि वे अपने भोगे हुए यथार्थ को साहित्य की विषयवस्तु बनाए ताकि पुनः सम्पूर्ण समाज में अपने विचारों को फैला सकें।
डॉ. सुमन ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि देखने में आया है कि अब दलित साहित्य व साहित्यकार कई खेमों में बंट गए हैं। जिस तरह से दलित जाति कई उप जातियों में बंटी हैं उसी तरह से दलित साहित्य व साहित्यकार भी बंटे हुए हैं जिससे दलित साहित्य पर भी उसका प्रभाव पड़ा है जो कि भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। उन्होंने बताया कि मराठी दलित साहित्य पर तथागत बुद्ध, कबीर, ज्योतिबा फुले व बाबा साहेब की वैचारिकी का गहरा प्रभाव था जिससे मराठी दलित साहित्य अम्बेडकरी साहित्य के निकट दिखाई देता है। उसका सबसे बड़ा कारण है कि वे दलितों के बीच रहकर उनकी समस्याओं से रूबरू होते हैं, उनके साथ घटित होने वाली घटनाओं को कहानी, कविता व लेख के माध्यम से अपनी बात जनता व सरकार तक पहुंचाते हैं।
ज्योतिबा फुले व डॉ. अम्बेडकरवादी साहित्य से संबंधित कुछ छात्रों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का डॉ. हंसराज सुमन ने बड़ी बेबाकी के साथ जवाब दिया और कहा कि वर्तमान दलित साहित्य ज्योतिबा फुले व अम्बेडकरवादी वैचारिकी तथा अपने सामाजिक दायित्व से पीछे हटता जा रहा है । आज के दलित साहित्यकार अम्बेडरवादी साहित्य व ज्योतिबा फुले के साहित्य को पढ़े बिना लिख रहे हैं। वे कहानियों, उपन्यासों व आत्मकथाओं में अपनी पीड़ा को व्यक्त करते हैं जबकि उन्हें समाज में घटित जातिगत भेदभाव को दर्शाना चाहिए। दलित साहित्य, भारतीय साहित्य की एक अत्यंत महत्वपूर्ण धारा है, जिसकी नींव बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के क्रांतिकारी विचारों पर रखी गई है। डॉ. अम्बेडकर ने सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था की जड़ों पर प्रहार करते हुए, दलितों के लिए समानता, न्याय और अधिकारों की आवाज़ बुलंद की। उनके विचारों ने दलित लेखकों को एक नई दृष्टि, एक नया नजरिया प्रदान किया और दलित साहित्य के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
उन्होंने बताया कि अस्मितामूलक साहित्य में भारतीय समाज में जाति और वर्ण पर आधारित भेदभावपूर्ण व्यवस्था, सदियों से दलितों के लिए एक अभिशाप बनी रही, जिसने उन्हें शोषण और उत्पीड़न का शिकार बनाए रखा। दलित-लेखन और दलित-विमर्श का उद्भव इसी सामाजिक विसंगति, इसी अमानवीय व्यवस्था के खिलाफ एक प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ। दलित साहित्य का उद्देश्य मात्र पीड़ा का चित्रण करना नहीं है, बल्कि उस पीड़ा के मूल कारणों, यानी जाति व्यवस्था और छुआछूत जैसी कुरीतियों की जड़ों को उखाड़ फेंकना है। यह साहित्य दलितों को उनकी पहचान का बोध कराता है, उन्हें एक आवाज देता है, उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करता है और समाज में व्याप्त असमानता के खिलाफ संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। दलित साहित्य का उद्देश्य केवल विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज के निर्माण का सपना भी संजोए हुए है, जहाँ सभी मनुष्यों को बिना किसी भेदभाव के समान अधिकार और सम्मान प्राप्त हो। डॉ. अम्बेडकर ने अपने लेखन के माध्यम से दलितों को एक नई चेतना, एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया। उनके लेखन में राजनीति, धर्म, दर्शन और समाज-सम्बन्धी विचारों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है, जो दलितों के उत्थान और समानता के लिए उनके समग्र दृष्टिकोण को दर्शाता है।
डॉ. हंसराज सुमन ने दलित साहित्य के साथ-साथ दलित पत्रकारिता की भी चर्चा की और बताया कि डॉ. अम्बेडकर ने दलितों की आवाज को बुलंद करने और उन्हें शिक्षित करने के लिए पत्रकारिता को भी एक माध्यम बनाया। उनके द्वारा सम्पादित पत्र-पत्रिकाएँ, जैसे मूकनायक, बहिष्कृत भारत, प्रबुद्ध भारत, जनता आदि दलितों के लिए ज्ञान और चेतना के नए द्वार खोलते हैं। ये पत्र-पत्रिकाएँ न केवल दलितों के अधिकारों के लिए आवाज उठाती थीं, बल्कि उन्हें शिक्षा, साहित्य और समसामयिक मुद्दों पर भी जागरूक करती थीं। इन पत्र-पत्रिकाओं में व्यक्त उनके विचार दलित-साहित्य और दलित-चिन्तन के लिए आज भी प्रासंगिक हैं, जो दलित लेखकों और बुद्धिजीवियों को प्रेरणा प्रदान करते हैं।
वर्तमान दलित साहित्य व साहित्यकार के समक्ष चुनौतियों पर छात्रों से चर्चा करते हुए डॉ. हंसराज सुमन ने बताया कि जिस गति से दलित साहित्य लिखा जा रहा है उस गति से पाठकों के बीच पहुँच नहीं रहा है। दलित साहित्य के पाठक तो है मगर उसको खरीदकर पढ़ने वालों की संख्या में इजाफा नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि यदि दलित ही अपने साहित्य को खरीदकर पढ़ने लगे तो इससे लेखक का मनोबल बढ़ेगा और उसकी समाज में प्रतिष्ठा बढ़ेगी। बुद्ध, कबीर व डॉ.अम्बेडकर ही अकेले ऐसे बहुजन समाज के नायक हैं जिनको विदेशों में पढ़ा जा रहा है । इस परिचर्चा कार्यक्रम में छात्रों द्वारा अनेक प्रश्न पूछे गए जिसका डॉ.सुमन ने बड़े प्रभावी ढंग से जवाब दिया और कहा कि दलित साहित्य तभी आगे बढ़ सकता है जब वह अन्य दलित साहित्यकारों को जो अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में लिख रहे हैं साथ लेकर चले। दलित साहित्य केवल साहित्य ही नहीं बल्कि जन आंदोलन है। यही जन आंदोलन एक दिन साहित्य का रूप लेगा। इस कार्यक्रम में श्री अमित पाल, कु.संध्या शर्मा, कु. कंचन, श्री दुष्यंत कुमार, श्री राम केवल व श्री शनिदेव प्रताप सिंह आदि भी उपस्थित थे।
Click Here for More Institutional Activities