महेंद्रगढ़ : हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय (हकेवि), महेंद्रगढ़ के जैव रसायन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. पवन मौर्या को 48 लाख रूपये की अनुदान राशि प्राप्त हुई है। उन्हें यह राशि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली की ओर से अंतर्गर्भाशय अस्थानता या नियमित माहमारी में आने वाली समस्याओं पर शोध करने के लिए प्राप्त हुई है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर टंकेश्वर कुमार ने प्रो. पवन मौर्या की इस उपलब्धि पर उनको बधाई दी और कहा कि विश्वविद्यालय शोध के क्षेत्र में निरंतर प्रयोग करना जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का मुख्य लक्ष्य समाज के सभी वर्गों का सर्वांगीण विकास है। उन्होंने कहा कि उनको यकीन है कि पवन मौर्या का यह शोध महिलाओं के विकास में अहम साबित होगा और महिलाओं को अंर्तगर्भाशय नामक बीमारी से निजात दिलाने में मददगार साबित होगा। उन्होंने कहा कि अनुदान राशि से वे इस शोध पर विस्तारपूर्वक तीन साल के लिये कार्य कर पाएंगे और इस समस्या का समाधान देश के सामने प्रस्तुत करेंगे। विश्वविद्यालय केस्कूल ऑफ इंटरडिसिप्लिनरी एंड एप्लाइड साइंसेस की डीन प्रोफेसर नीलम सांगवान ने भी प्रोफेसर पवन मौर्या को उनको इस उपलब्धि के लिये बधाई दी।
प्रो. पवन मौर्या ने बताया कि काफी बार महिलाओं के अंडाशय के आसपास उत्तक इक्ट्ठे हो जाते है। इस कारण महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमितता के साथ ही बच्चेदानी का खराब होना या समय पर बच्चें ना होना जैसी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उनके पास इसके बाद शल्य चिकित्सा या आप्रेशन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। उन्होंने बताया कि उनका शोध महिलाओं की इस समस्या का आरंभ में ही पता लगाकर निदान करने में सहायक होगा। प्रो. मौर्या ने बताया कि भारत में इस समय लगभग 35 प्रतिशत महिलाएं इस प्रकार की समस्याओं का सामना कर रही हैं। इसके साथ ही इस समस्या से संबंधित महिलाओं की संख्या में लगातार वृद्धि भी हो रही है। उन्होंने कहा कि इस समस्या के कारण ना केवल महिलाओं के व्यवहार में परिवर्तन आता है। वरन वह मातृत्व सुख से भी वंचित रह जाती है साथ ही उसको असहनीय पीड़ा से गुजरना पड़ता है। महिलाओं को इस समस्या के कारण काफी बार अन्य दूसरी समस्यायें भी उत्पन्न हो जाती है। उनका शोध इस समस्या का आरंभ में ही पता लगाकर उसका निदान करने का कार्य करेगा ताकि महिलाओं को जीवन में किसी भी प्रकार की समस्या का सामना ना करना पड़े।
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