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अरबिंदो कॉलेज में हुआ वन नेशन, वन इलेक्शन संगोष्ठी का सफल आयोजन

वक्ताओं ने वन नेशन, वन इलेक्शन को केवल एक चुनावी सुधार नहीं, बल्कि भारत को एक विकसित, संगठित और प्रभावी लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया

नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध श्री अरबिंदो कॉलेज में वन नेशन, वन इलेक्शन विषय पर एक विचारोत्तेजक और अत्यंत प्रासंगिक संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी देश के समकालीन राजनीतिक एवं चुनावी सुधारों पर केंद्रित थी, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी, सशक्त और विकासोन्मुख बनाने पर गहन चर्चा हुई। इस अवसर पर वरिष्ठ प्रो. रेखा सक्सेना (विभाग प्रमुख, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. हिमांशु रॉय (प्रमुख, राजनीति अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) विशिष्ट वक्ता के रूप में और प्रो. अरुण चौधरी, प्राचार्य एवं डॉ प्रशांत बड़थ्वाल, विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, श्री अरबिंदो कॉलेज उपस्थित रहे। इसके अलावा डॉ आदित्य नारायण मिश्रा, डॉ एस. एस. राणा, प्रो विपिन कुमार मल्होत्रा, प्रो हंसराज सुमन, डॉ रौनक पाठक, डॉ हरीश कुमार, डॉ अनुराग पांडे, डॉ सुरभि सहगल, डॉ लमनेवाह सित्लहो, डॉ सचिन, एकता बसोया, अविनाश नेगी, विकाश आनंद, डॉ अनिल मावी, डॉ नरपत नेनीवाल, डॉ नीतू दिवेदी, डॉ कल्पिता, डॉ पूनम जैन, प्रो मीनाक्षी चौधरी, डॉ नौशाबा शेख, डॉ ओमप्रकाश यादव, डॉ नितिन, एवं डॉ चाँदनी सेनगुप्ता सहित अन्य सभी विभाग के शिक्षकगण भी मौजूद रहे । 

        संगोष्ठी में सभी वक्ताओं ने अपने-अपने दृष्टिकोण से वन नेशन, वन इलेक्शन की अवधारणा पर विस्तार से प्रकाश डाला। कॉलेज के प्राचार्य प्रो . अरुण चौधरी ने कार्यक्रम की शुरुआत में कहा कि एक साथ चुनाव कराए जाने से न केवल समय, धन और प्रशासनिक संसाधनों की बचत होगी, बल्कि इससे शासन की निरंतरता और नीतिगत स्थिरता भी सुनिश्चित होगी। बार-बार होने वाले चुनावों के कारण विकास कार्यों में जो व्यवधान आता है, वन नेशन, वन इलेक्शन उस बाधा को दूर करने में सहायक सिद्ध हो सकता है। इससे सरकारें अधिक समय तक विकास, सुशासन और जनकल्याण पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगी। संगोष्ठी में डॉ बड़थ्वाल ने यह भी रेखांकित किया गया कि यह इतिहासिक सुधार राष्ट्र की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को और अधिक सुदृढ़ बना सकता है। नीति-निर्माण में दीर्घकालिक सोच को बढ़ावा मिलेगा और चुनावी खर्च में कमी आने से सार्वजनिक धन का बेहतर उपयोग संभव होगा। साथ ही, राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर राजनीतिक स्थिरता बढ़ने से भारत के समग्र विकास को नई गति मिल सकती है।

 विशिष्ट वक्ता प्रो हिमांशु रॉय ने यह स्पष्ट किया कि वन नेशन, वन इलेक्शन की व्यवस्था देश को प्रशासनिक, आर्थिक और लोकतांत्रिक—तीनों स्तरों पर मजबूत बनाने की क्षमता रखती है। एक साथ चुनाव होने से बार-बार लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता की समस्या समाप्त होगी, जिससे केंद्र और राज्य सरकारें निर्बाध रूप से विकास योजनाओं को लागू कर सकेंगी। नीति-निर्माण में निरंतरता आएगी, निवेश का माहौल बेहतर होगा और शासन अधिक जवाबदेह बनेगा। प्रो रॉय ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए बताया कि स्वतंत्रता के बाद शुरुआती वर्षों में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाते थे, जिससे शासन प्रणाली में स्थिरता और प्रशासनिक दक्षता बनी रहती थी। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि यह विचार भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा से असंगत नहीं, बल्कि उसी का व्यावहारिक विस्तार है। संगोष्ठी में वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर भी गंभीर चर्चा हुई, जहाँ यह रेखांकित किया गया कि किस प्रकार कुछ विपक्षी दल वन नेशन, वन इलेक्शन को केवल राजनीतिक चश्मे से देखकर भ्रांतियाँ फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रो रेखा सक्सेना ने तथ्यों और तर्कों के माध्यम से इस विषय का विश्लेषण करते हुए बताया कि सुधारों का विरोध प्रायः दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की बजाय तात्कालिक राजनीतिक लाभ से प्रेरित होता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों, संवैधानिक प्रावधानों और प्रशासनिक अनुभवों के आधार पर यह स्पष्ट किया गया कि यदि इसे व्यापक संवाद, सहमति और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लागू किया जाए, तो यह सुधार भारत के लोकतंत्र को और अधिक सशक्त, संगठित तथा विकासोन्मुख बना सकता है।

अंततः संगोष्ठी में यह निष्कर्ष निकला कि वन नेशन, वन इलेक्शन केवल एक चुनावी सुधार नहीं, बल्कि भारत को एक विकसित, संगठित और प्रभावी लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कदम है। इस संगोष्ठी ने छात्रों, शिक्षकों और बुद्धिजीवियों को इस विषय पर गंभीरता से सोचने और संवाद स्थापित करने का सशक्त मंच प्रदान किया।

 

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