नई दिल्ली: इंडियन नेशनल टीचर्स कांग्रेस (इंटेक) ने दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा जारी एक हालिया ट्वीट की कड़ी निंदा की है। यह ट्वीट लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों में साक्षात्कार की भूमिका को लेकर दिए गए बयान के संदर्भ में किया गया था। इंटेक का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को सार्वजनिक टिप्पणी करने से पहले स्वयं भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े तथ्यों और आंकड़ों की समीक्षा करनी चाहिए।
इंटेक के अनुसार, विश्वविद्यालय के कई विभागों में एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणियों के तहत विज्ञापित बड़ी संख्या में शिक्षकीय पदों को साक्षात्कार के बाद “नॉट फाउंड सूटेबल (एनएफएस)” घोषित कर दिया गया। संगठन का दावा है कि यह तब हुआ जब योग्य अभ्यर्थी उपलब्ध थे और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए औपचारिक स्क्रीनिंग तंत्र भी मौजूद था। संगठन का कहना है कि पिछले कई वर्षों से “एनएफएस” का बार-बार उपयोग शिक्षकों, छात्रों और संसदीय समितियों के बीच गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।
इससे यह सवाल उठता है कि क्या आरक्षण नीति को सही तरीके से लागू किया जा रहा है। इंटेक ने यह भी कहा कि श्री गांधी पहले भी इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। मई 2025 में डीयू में छात्रों और शिक्षकों के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने एनएफएस के कथित दुरुपयोग को “नया मनुवाद” बताया था। हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भी उनकी टिप्पणी भर्ती प्रक्रियाओं के उस प्रभाव की ओर संकेत करती थी, जिसके कारण आरक्षित पद साक्षात्कार के बाद खाली रह जाते हैं।इंटेक का आरोप है कि विश्वविद्यालय का ट्वीट उनके बयान के संदर्भ को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है और मूल मुद्दे—आरक्षित शिक्षकीय पदों के खाली रहने—से ध्यान भटकाता है। संगठन ने कहा कि एक सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित विश्वविद्यालय को अपने आधिकारिक संचार माध्यमों का उपयोग संवैधानिक पद पर बैठे विपक्ष के नेता की आलोचना के लिए नहीं करना चाहिए। इस बयान पर प्रो. रामानंद सिंह, प्रो. नीलम, डॉ. लतिका गुप्ता और अमन कुमार सहित कई पदाधिकारियों ने हस्ताक्षर किए हैं।
इंटेक की प्रमुख मांगें
इंडियन नेशनल टीचर्स कांग्रेस ने डीयू प्रशासन से तीन प्रमुख मांगें रखी है कि राहुल गांधी के खिलाफ जारी ट्वीट को वापस लेकर सार्वजनिक रूप से माफी मांगी जाए। हाल के भर्ती चक्रों में “नॉट फाउंड सूटेबल (एनएफएस)” घोषित किए गए सभी पदों की पारदर्शी समीक्षा कराई जाए। विश्वविद्यालय के सभी विभागों में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित पदों को संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार भरा जाना सुनिश्चित किया जाए। इंटेक ने कहा कि भारत के प्रमुख सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में से एक होने के नाते डीयू को समानता, सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखना चाहिए। संगठन ने उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई।
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