दिल्ली सरकार द्वारा पोषित बारह कॉलेजों को बचाने के लिए एलजी करें हस्तक्षेप

 

नई दिल्ली। संसद से पारित दिल्ली सरकार  पैटर्न ऑफ असिस्टेंट,  वेतन और ग्रांट रोकने तथा  जबरदस्ती सीनियर अकाउंट अधिकारी की नियुक्ति जैसी परेशानियां पैदा कर  12 पूर्ण  वित्त पोषित कॉलेजों का निजीकरण करने पर आमदा है। दिल्ली सरकार के  निजीकरण से  उच्च शिक्षा न केवल कमजोर वर्ग की पहुंच से बाहर होगी बल्कि उसमें राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा । राष्ट्रीय राजधानी  क्षेत्र अध्यादेश के पारित होने और उसमें उपराज्यपाल को सर्वेसर्वा होने से इन कॉलेजों के बचने की एक उम्मीद जगी है।  एनडीटीएफ इन कॉलेजों को दिल्ली सरकार के निजीकरण अभियान से बचाने के लिए हर संभव प्रयास करेगा ।

 उक्त विचार एनडीटीएफ अध्यक्ष डॉ ए के भागी  ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली  सरकार अध्यादेश -- मंत्रिमंडल या उप राज्यपाल की शक्तियां और इनका दिल्ली सरकार के वित्त पोषित कॉलेजों पर प्रभाव विषय पर आयोजित वेबीनार  के धन्यवाद प्रस्ताव में व्यक्त किए। एडवोकेट और दिल्ली विश्वविद्यालय की नवनिर्वाचित कार्यकारी परिषद  सदस्य मोनिका अरोडा ने इस अवसर पर कहा कि  शिक्षकों और कर्मचारियों के काम का समय पर वेतन न देना  मानव अधिकारों का उल्लंघन है।  वैश्विक महामारी में दिल्ली सरकार के अंतर्गत काम कर रहे डॉक्टर , सफाई कर्मचारी,  पैरामेडिकल स्टाफ,  इंजीनियर तथा  शिक्षकों व कर्मचारियों को  समय पर वेतन न मिलने के कारण अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ा।  कोर्ट के आदेशों के बाद भी स्थिति अत्यंत शोचनीय है।  कॉलेजों में पर्याप्त ग्रांट न मिलने  के कारण अनेक समस्याएं पैदा हो रही हैं ।

 मोनिका अरोड़ा ने कहा कि नए अध्यादेश के तहत संविधान में उपराज्यपाल दिल्ली के सर्वेसर्वा हैं ।  इस आदेश के अनुसार दिल्ली राजधानी सरकार का मतलब उपराज्यपाल है । संसद इस संबंध में कानून बना सकती है।  मंत्रिमंडल को कोई भी निर्णय लेने से पहले उप राज्यपाल की अनुमति प्राप्त करनी होगी।  राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र होने के कारण परस्पर टकराव से बचने के लिए शक्ति का स्पष्टीकरण अनिवार्य था।  उन्होंने कहा कि शिक्षकों को अपनी समस्या के लिए समुचित प्रक्रिया का पालन करते हुए उप राज्यपाल को ज्ञापन देना चाहिए और वेतन ,ग्रांट और अकादमिक स्वायतता  की लड़ाई को कोर्ट से लेकर संसद तक लडा  जाना चाहिए ।दिल्ली विश्वविद्दालय की वित्तीय समिति के सद्स्य एड्वोकेट राजेश गोगना ने बताया कि पावर का विभाजन होने बाद अब उपराज्यपाल को सुनिश्चित करना चाहिए कि वेतन जैसा मानव अधिकार समय पर मिले ।  

एनडीटीएफ के पूर्व अध्यक्ष डॉ आई एम कपाही ने कहा कि  दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल की शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होने से उम्मीद है कि यह  मुद्दा समाधान की दिशा में आगे बढ़े । पूर्व डूटा  अध्यक्ष डॉ एन के कक्कड़ ने कहा कि उपराज्यपाल को अब शिक्षक और  कर्मचारियों की वेतन के मुद्दे पर दिल्ली सरकार को स्पष्ट निर्देश जारी करना चाहिए । दिल्ली विश्वविद्यालय कार्यकारी परिषद के सदस्य डॉ बीएस नेगी ने कहा कि वेतन और ग्रांट को अपर्याप्त और  अनियमित करना तथा  प्रशासनिक परेशानियां  पैदा करने के पीछे का कारण यही है कि दिल्ली सरकार की नीयत इन कॉलेजों को लेकर साफ नहीं है । वह जानबूझकर संवैधानिक संकट पैदा कर शिक्षकों कर्मचारियों के जीवन से खिलवाड़ कर रही है ।

इस अवसर पर इन बारह कॉलेजों में कार्यरत शिक्षकों ने वेतन और ग्रांट  रोक देने के बाद वैश्विक महामारी में उनके जीवन पर पड़े प्रभाव को लेकर अपने दर्द भरे अनुभव साझा किए । उन्होंने बताया कि समय पर वेतन न मिलने से उन्हें किराए देने की दिक्क्त से लेकर , बच्चों की स्कूल की फीस,  तथा  इलाज में आने वाली परेशानियों  जैसी दिक्कतों को झेला है।  इस कार्यक्रम में सैकड़ों शिक्षकों ने भाग लिया ।