अमजद अली खान ने शिष्यों के साथ रंग जमाया

 

  • ‘दीक्षा’: आईजीएनसीए की एक नई पहल
  • शास्त्र और प्रयोग: गुरु शिष्य परम्परा पर केन्द्रित है आईजीएनसीए की यह नयी शृंखला

नई दिल्ली। उस्ताद अमजद अली खान साहब और उनके 3 दर्जन शिष्य एक साथ, एक मंच पर मौजूद थे, मौका था इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) द्वारा शुरू की गयी नयी शृंखला ‘दीक्षा’ कार्यक्रम का । आईजीएनसीए द्वारा गुरु-शिष्य परम्परा पर केन्द्रित इस शृंखला का पहला कार्यक्रम उस्ताद अमजद अली खान द्वारा रचित बन्दिशों को समर्पित रहा, जिसमें देश भर से 28 कलाकारों ने मंचीय प्रस्तुति दी।  

आईजीएनसीए में तीन दिनों तक चले ‘दीक्षा’ कार्यक्रम का शुभारंभ  अरुण गोयल, सचिव, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, मशहूर सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान व आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ सच्चिदानंद जोशी ने दीप प्रज्वलन कर किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ करते हुये श्री अरुण गोयल ने कहा कि “उस्ताद जी चाहते हैं कि इस तरह का आयोजन हर वर्ष किया जाय तो संस्कृति मंत्रालय आपको आश्वस्त करता है कि आप अपनी चाहत के अनुरूप हर वर्ष इस प्रकार का आयोजन करेंगे । उस्ताद जी के शिष्यों के लिए ये बड़ी आनंद कि बात होनी चाहिए कि उनके गुरु व्यक्तिगत रूप से उनके लिए इस कार्यक्रम के संयोजन में जुटे हैं।”

 आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ जोशी ने इस मौके पर कहा की हमारी बड़े समय से इच्छा थी की हम गुरु शिष्य परंपरा पर आधारित कोई शृंखला का आयोजन करें और ऐसे में हमे उस्ताद अमजद अली खान की प्रेरणा व उत्साह मिला जिसके फलस्वरूप आज हम आपके सामने तीन दिनों तक चलने वाले “दीक्षा: गुरु-शिष्य परंपरा” पर केन्द्रित शृंखला को मूर्त रूप दे पा रहे हैं, हम उस्ताद जी व सरोद घर के सहयोग के लिए उनके आभारी हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु शिष्य परंपरा का महत्वपूर्ण स्थान रहा है और जब हम शास्त्र और प्रयोग की बात करते हैं तो उसमें गुरु व शिष्य परम्परा का महत्वपूर्ण स्थान रहा है, चाहे वो कला का कोई भी रूप मूर्त-अमूर्त क्यों न हो उसमें गुरु-शिष्य की जो साध है उसे जानना, समझना किसी भी कला प्रेमी के लिए आवश्यक है, इस दृष्टि से ‘दीक्षा’ आईजीएनसीए की नयी शृंखला न केवल कला की अलग-अलग रूपों को प्रस्तुत करेगी बल्कि गुरु और शिष्य के पावन संबंध को समाज के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास करेगी। हमारा सौभाग्य है कि हम अपनी इस शृंखला का शुभारंभ उस्ताद अमजद अली खान जैसे सिद्धहस्त व बड़े संगीतज्ञ द्वारा हो रहा है ।  हम साल में 3 या 4 बार इस शृंखला का आयोजन करने की योजना बना रहे हैं ताकि इसके माध्यम से हम कला के विविध माध्यमों को प्रस्तुत कर सकें ।

उस्ताद अमजद अली खान ने इस मौके पर अपने विचार व्यक्त करते हुये कहा कि “किसी भी इंसान का पहला गुरु उसकी माँ ही होती है, आयन और अमान कि माँ भी उन दोनों कि पहली गुरु है। शिष्य भले ही बाहर से आता है लेकिन तालिम मे फर्क नही होता, वही रचना है, वही राग है जो अयान बाजा रहा है या कोई बाहर से आया शिष्य, ये उनके हाथ में हैं जो जितना रियाज करेगा वो उतना ही निखरेगा।”   
कार्यक्रम के पहले दिन सृनजॉय मुखर्जी, (सरोद) बिसवाजित रॉय चौधरी (सरोद), रोहन प्रसन्ना (सरोद), प्रीतम घोसल(सरोद), पार्थो रॉय चौधरी (संतूर), मुकेश शर्मा (सरोद), ने अपनी एकल प्रस्तुति दी वहीं सुनंदों मुखर्जी (सरोद) व सचिन पटवर्धन (गिटार), देबशंकर रॉय व ज्योतिशंकर रॉय (वाइलिन बंधु), सरोज घोष व सुभाष घोष (गिटार) ने जुगलबंदी की। उत्सव के आखिरी दिन जहां एक और स्मिता नागदेव, सुनील सक्सेना व आसा सिंह नामधारी ने सितार पर तिगलबंदी से मंत्र मुग्ध किया वहीं दूसरी देब्ज्योती बोस ने अपने सरोद वादन से श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया । 
         इन तीन दिनों तक चले इस पूरे उत्सव में श्रोताओं को जिस पल का इंतज़ार था वो उत्सव के आखिरी दिन उस्ताद अमजद अली खान साहब का अपने शिष्यों के साथ मंचीय प्रस्तुति, उस्ताद जी जब अपने 6 शागिर्दों के साथ मंच पर चढ़े तो श्रोताओं ने ताली की गड़गड़ाट के साथ उनका स्वागत किया, उन्होने अपने सरोद वादन से पहले आईजीएनसीए का धन्यवाद करते हुये कहा कि “मैं शुक्रगुजार हूँ आईजीएनसीए का जो उन्होने इस शृंखला का आयोजन किया है, खासकर डॉ सच्चिदानंद जोशी जी का जिन्होने इस कार्यक्रम को साकार रूप दिया।” उन्होने अपने वादन कि शुरुआत राग खमाज से कि, उनके साथ मंच पर संगत दे रहे थे सरोद पर  मुकेश शर्मा व देब्ज्योती बोस, देबशंकर रॉय व ज्योतिशंकर रॉय (वाइलिन बंधु), और तबले पर संगत कर रहे थे राशिद मुस्तफ़ा थिरकवा एवं सुधीर पांडे । लगभग सवा घंटे तक चली प्रस्तुति का समापन खान साहब ने “वैष्णव जन तो....” भजन के साथ की ।