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टीचर्स और सुविधाओं के अभाव 12 काॅलेज की स्थिति चिंताजनक: एनडीटीएफ

कॉलेजो में न संसाधन हैँ ना अध्यापक, कालेजों का अनुदान बढ़ाने की मांग

 

नई दिल्ली। नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि दिल्ली सरकार की स्व वित्तपोषित नीति से  दिल्ली विश्वविद्यालय के 12 काॅलेजों में टीचर्स और सुविधाओं की भारी कमी हो गई है और ये कॉलेज बीमारू संस्थान बन गए हैं।

             संसाधनों के अभाव में इन काॅलेजों की हालत कुछ ऐसी है कि अनेक कक्षाओं में अध्यापन के लिए स्थायी शिक्षक नहीं हैं, प्रयोग के लिए प्रयोगशालाएं नहीं, स्कूल भवन में चल रहे कुछ काॅलेज नए भवनों की बाट जोह रहे हैं तो जिन काॅलेजों को नए भवनों में स्थानांतरित किया गया है वो सालों से रखरखाव के लिए नियमित अनुदान के अभाव में खस्ताहाल स्थिति में पहुंच गए हैं।  नेशनल             डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट       ने दिल्ली सरकार के द्वारा इन काॅलेजों को जारी 100 करोड़ रूपये की राशि के अनुदान को अपर्याप्त बताया है। 

         एन डी टी एफ महासचिव प्रो वी एस नेगी के अनुसार सरकार संस्थानों को चौपट कर रही है जोकि स्वीकार्य नहीं है। 
आज जो स्थिति देखने को मिल रही है वो पिछले पांच वर्षों मे फंड कटने के कारण  स्थिति पैदा हुई है। इन काॅलेजों की हालत इतनी खराब है कि डीयू के ये कॉलेज 10 साल या उससे अधिक समय से शिक्षकों या गैर-शिक्षण कर्मचारियों की एक भी स्थायी नियुक्ति नहीं कर सके हैं। जबकि दूसरी तरफ डीयू के अन्य  कॉलेजों ने पिछले दो वर्षों में नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी कर ली है या चल रही है।
       एन डी टी एफ सचिव सुनील शर्मा ने बताया कि दिल्ली सरकार के लापरवाह रवैये के कारण मौजूदा शैक्षणिक सत्र में विद्यार्थियों की कक्षाएं प्रभावित हो रही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन कॉलेजों में 600 से अधिक स्थाई पद खाली हैं,कॉलेज की प्रयोगशालाएँ, कार्यालय, पुस्तकालय, सामान्य रखरखाव आदि सभी बुरी तरह प्रभावित हैं और इन संस्थानों को चलाना अब असंभव हो गया है। इन कॉलेजों में बने इन हालातों के परिणामस्वरूप विद्यार्थी, शिक्षाविद और शोधार्थी सबसे अधिक प्रभावित हैं। 
दिल्ली सरकार द्वारा वित्तपोषित इन कालेजों में शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं दिया जाता है, जबकि कॉलेज लगभग आधी क्षमता पर चल रहे हैं।  कई मामलों में शिक्षकों और कर्मचारियों को फंड की कमी के कारण लंबे समय से लंबित बकाया, मेडिकल बिल, एलटीसी आदि का भुगतान नहीं किया जा रहा है। 
        सुनील शर्मा ने बताया कि इन काॅलेजों से सेवानिवृत शिक्षकों की बात करें तो उन्हें भी समय पर पेंशन और मेडिकल खर्च उपलब्ध नहीं कराये जा रहे है जोकि सरासर अन्याय और अमानवीय है।  दिल्ली सरकार की फंड कट नीति के अंतर्गत ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि कोई सरकार अपने कर्मचारियों के वेतन का भगुतान करने के लिए अनुदान जारी करते समय मीडिया में जाकर बयान दे रही है। यह सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है। क्योंकि दिल्ली सरकार अपनी फंड कट नीति, 7वें वेतन आयोग के बाद से लंबे समय से बकाया राशि के भुगतान और पदोन्नति, सेवानिवृत्ति लाभ और अन्य देय राशि जैसे चिकित्सा बिलों की प्रतिपूर्ति आदि का भुगतान न करने की सच्चाई को छिपाना चाहती हैं। 
आप सरकार द्वारा रविवार को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई जिसमें कहा गया कि चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही के लिए 100 करोड़ रुपये का अनुदान मंत्रालय द्वारा जारी या स्वीकृत किया गया था। यहाँ जमीनी स्तर पर महत्वपूर्ण तथ्य जाँचे गए हैं। कॉलेजों को इस संबंध में न तो कोई सूचना भेजी गई और न ही अनुदान। अक्टूबर के पहले दिन देय सितंबर महीने का वेतन जो दूसरी तिमाही का है, फंड कट के कारण भुगतान नहीं किया गया है।  इसका मतलब यह है कि पहली दो तिमाहियों में जारी किए गए 100 से अधिक 100 करोड़ रुपये के फंड कर्मचारियों को वेतन देने के लिए अपर्याप्त थे, बावजूद इसके दिल्ली सरकार बेशर्मी के साथ अपने खामियों पर पर्दा डाल रही है।  दिल्ली सरकार द्वारा लगातार जारी फंड में कटौती के कारण 2020 से 2024 तक पिछले वित्तीय वर्षों के बदले में एकमुश्त अनुदान जारी नहीं किया गया है, इसलिए, जब भी तीसरी तिमाही की रिलीज प्राप्त होगी, उससे लंबे समय से लंबित बकाया राशि का भुगतान करने की बहुत कम संभावना है। जहां तक काॅलेजों में अध्ययन-अध्यापन की बात है तो इन कॉलेजों में कार्यरत अधिकतर तदर्थ शिक्षक यूजीसी द्वारा वित्त पोषित कॉलेजों में नियुक्त पाकर इन काॅलेजों से जा चुके है और जो बचे हैं उन्हें दिल्ली सरकार के खराब शिक्षा मॉडल के कारण इन कॉलेजों में नियुक्ति मिलने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। कई  कॉलेज आज भी पुराने खस्ताहाल स्कूल भवनों में चल रहे हैं जहां कभी भी कोई बड़ी दुर्घटना घट सकती है। उच्च शिक्षा के लिए इच्छाशक्ति और धन की कमी के कारण इन कॉलेजों को अपने स्वयं के भवनों में चलाने की दिल्ली सरकार की कोई योजना नहीं है।

 

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