डीयू : 65 वर्ष बाद शिक्षकों को सेवा विस्तार देने का विरोध
  • डीयू : उच्चस्तरीय कमेटी की बैठक में हुआ हंगामा
  • वाइस  प्रिंसिपल की नियुक्तिप्रक्रिया और अर्हता को लेकर असहमति जताई गई
  • प्रिसिपल के कार्यकाल को बढ़ाने का किया गया विरोध
 
नई दिल्ली। दिल्ली विविद्यालय द्वारा शिक्षकों की सेवा शर्तो  को लेकर गठित उच्च स्तरीय कमेटी की सोमवार को आयोजित बैठक में हंगामा हुआ। बैठक में निर्वाचित प्रतिनिधियों ने शिक्षक हित के हर मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया। तीन घंटे से अधिक चली इस मीटिंग में कई विवादास्पद मुद्दों पर चर्चा हुई।
          उच्च स्तरीय कमेटी के सदस्य प्रो हंसराज और डॉ रसाल सिंह ने शिक्षकों को 65 साल की आयु में सेवानिवृति के बाद 5 साल के लिए कंट्रेक्ट पर सेवा विस्तार देने का विरोध किया। उन्होंने बताया कि इससे युवा पीढ़ी के लिए संभावनाएं कम हो जाएंगी और विविद्यालय में कांट्रेक्ट अप्वाइंटमेंट का रास्ता खुल जाएगा जो कि उच्च शिक्षा के लिए बड़ा खतरा साबित होगा। बैठक में प्रत्येक कलेज में वाइस प्रिंसिपल की नियुक्ति को अनिवार्य बनाए जाने को स्वागत योग्य कदम बताया गया, लेकिन उसकी प्रक्रिया को पारदर्शी व भेदभाव रहित बनाने को लेकर बहस हुई। प्रो हंसराज ने बताया कि वाइस प्रिंसिपल की नियुक्ति में जोड़तोड़ और मनमानी पर रोक लगाना, कॉलेज के विकास और स्वस्थ वातावरण के लिए जरूरी है। हम इस पर कोई समझौता नहीं करेंगे। उन्होने बताया कि प्रिंसिपल को 5 साल का एक ओर कार्यकाल देने से कॉलेज के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। डूटा की बहुत पुरानी मांग रही है कि  प्रिंसिपल को 5 साल का एक ही कार्यकाल मिलना चाहिए। हम इस मांग को लागू कराने के लिए अडिग है । इसके अलावा पीएचडी न करने वाले शिक्षकों को भी एसोसिएट प्रोफेसर तक प्रमोशन देने की वकालत सभी शिक्षक प्रतिनिधियों ने की। इसमें डॉ रसाल सिंह, डॉ गीता भट्ट, डॉ पंकज गर्ग, डॉ वी एस दीक्षित आदि प्रमुख हैं। यह भी बताया है कि इन रेगुलेशंस ने कॉलेज के शिक्षकों के प्रोफेसर बनने का रास्ता साफ कर दिया है। यह रेगुलेशंस इस संदर्भ में ऐतिहासिक है कि अब कॉलेजों में र्थड प्रमोशन के रूप में प्रोफेसरशिप सुनिश्चित हो गई है। इसके बाद अगली मीटिंग अगले सप्ताह की शुरुआत में होगी, जिसमें कई अहम विषयों पर र्चचा होगी इनमें तदर्थ सर्विस सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।