वाम एकता के सामने फेल हुआ अभाविप का ’राष्ट्रवाद‘‘ 
सोशल सांइस के उम्मीदवार होने से वाम को लाभ
 
 अरुण कुमार पाण्डेय 
नई दिल्ली । वाम एकता के तीन उम्मीदवार सारिका, ऐजाज और अमुथा स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज (एसएसएस) के विद्यार्थी हैं। स्कूल ऑफ सोशल साइंस में एबीवीपी की पकड़ ठीक नहीं मानी जाती है। विवि के स्कूल ऑफ लैंग्वेज, लिटरेचर एंड कल्चर स्टडीज में सबसे ज्यादा 1,766 वोट पड़े, और स्कूल ऑफ सोशल साइंस में 1,320 वोट डाले गए। इन दोनों स्कूलों में एबीवीपी अच्छे वोट नहीं निकाल सकी जबकि वाम एकता के उम्मीदवारों को यहां करीब आधे वोट मिले। उम्मीदवारों का स्कूल ऑफ सोशल साइंस से होने का फायदा उन्हें भरपूर मिला। वहीं स्कूल ऑफ साइंसेज में एबीवीपी की स्थिति ठीक रही और परिषद के अध्यक्ष उम्मीदवार को विजयी उम्मीदवार से अधिक वोट मिले। 
लेफ्ट उम्मीदवारों को मिले कैडर से भी अधिक वोट, बापसा कमजोर हुई 
बढ़े मत प्रतिशत का सीधा लाभ वाम एकता को मिलाएबीवीपी का मत पिछले साल की तुलना में करीब पांच सौ बढ़ा, फिर भी हारे
वाम संगठनों की एकता के आगे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप)के ‘‘राष्ट्रवाद’ का मुद्दा फेल हो गया। एबीवीपी ने मतदान से ठीक पहले राष्ट्रवाद का कार्ड खेला था, और वाम एकता के अध्यक्ष उम्मीदवार पर फरवरी 2016 के उस कार्यक्रम में शामिल होने का आरोप लगाया था जिसमें कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाये गये थे। वह कार्यक्रम वाम संगठनों की ओर से कथित तौर पर संसद हमले के दोषी अफजल गुरू को फांसी दिये जाने के विरोध में आयोजित किया गया था। इस कार्ड ने वाम वोटरों में एकजुट करने में बड़ी भूमिका निभाई, क्योंकि फरवरी 2016 के उस कार्यक्रम को वामपंथी विचारधारा के बड़े धड़े का समर्थन हासिल था। एबीवीपी से अध्यक्ष पद के उम्मीदवार ने प्रेजिडेंशियल डिबेट में भी कहा था कि कैम्पस में ‘‘राष्ट्र विरोधी’ तत्व हैं और अगर वह चुनाव जीते तो उन्हें ‘‘ठिकाने’ लगा देंगे, वाम एकता उम्मीदवारों ने इसे अच्छे से भुनाया। चार संगठनों ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई), डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन (डीएसएफ) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआईएसएफ) वाम एकता (लेफ्ट यूनिटी) नाम का गठबंधन बनाकर मैदान में उतरे थे, जिससे उनके कैडर वोट कटने की संभावना कम थी, एबीवीपी के मुद्दों ने इसे संभव बना दिया। विवि में वाम संगठनों का कैडर वोट 18 सौ के करीब माना जाता है। वाम संगठनों के एकजुट होने का नुकसान बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन (बापसा) को भी हुआ, जिसे पिछले वर्ष वाम संगठनों की प्रतिद्वंद्विता का लाभ मिलता रहता था। पिछले वर्ष की स्थिति देखें तो वाम एकता (एआईएसएफ शामिल नहीं थी), एबीवीपी और बापसा के अध्यक्ष उम्मीदवार को क्रमश: 1506, 1042 और 935 वोट मिले थे, लेकिन इस साल बापसा के अध्यक्ष पद उम्मीदवार को महज 675 वोट मिले हैं। वहीं अभाविप के उम्मीदवारों को पिछले साल अध्यक्ष पद पर 1042, उपाध्यक्ष पद पर 1,028, महासचिव पद पर 975, और संयुक्त सचिव पद पर 920 वोट मिले थे, जबकि इस साल यह आंकड़ा क्रमश: 982, 1,012, 1,123 और 1,247 मत है। और एबीवीपी का कुल मत पांच सौ के करीब बढ़ा है। लेकिन बढ़े वोटिंग पर्सेट का सीधा लाभ वाम एकता उम्मीदवारों को मिला और जबकि एबीवीपी अपना वोट प्रतिशत बढ़ाने में नाकाम रही।  
साभार राष्ट्रीय सहारा