हिंदी साहित्य के विकास में बिहार का ऐतिहासिक योगदान :मैनेजर पांडेय
 
        नई दिल्ली।  वरिष्ठ साहित्यकार एवं समालोचक मैनेजर पांडेय ने शनिवार को कहा किं हिंदी  साहित्य के विकास में बिहार का ऐतिहासिक योगदान रहा है। हिंदी  के आदिकवि सरहपा बिहार के नालंदा विविद्यालय के आचार्य थे। उनकी विद्रोही चेतना का प्रभाव आगे चलकर हिंदी  निर्गुण भक्तकवि कबीर की रचनाओं पर भी दिखता है।
  उन्होंने कहा कि आदिकालीन कवि विद्यापति भी बिहार के थे जिनका प्रभाव सूरदास पर दिखता है।  पांडेय ने साहित्यिक पत्रिका ‘नई धारा’ द्वारा यहां आयोजित 14वें उदयराजं सिंह स्मृति व्याख्यान में यह बात कही। व्याख्यान का विषय  साहित्य को बिहार की देन’ था। 
           उन्होंने कहा कि हिंदी के चार विशिष्ट शैलीकार राजा राधिकारमरण प्रसादं सिंह, आचार्य शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी और फणीरनाथ रेणु बिहार से थे। इनकी रचनाशीलता ने पूरे देश मेंंिहदी का मान बढाया। उन्होंने कहा किं हिंदी की प्रथम खड़ी बोली के लेखक महेश नारायण भी बिहार से थे जिनका ‘स्वप्न’ शीषर्क काव्य 1881 में प्रकाशित हुआ था। साहित्य में आंचलिकता की शुरूआत ‘देहाती दुनिया’ (1926), ‘बलचनमा’ (1948), ‘मैला आंचल’ (1954) जैसे उपन्यासों से मानी जाती है। इन सभी रचनाओं के लेखक बिहार से थे।  उन्होंने कहा कि जनार्दन झा ‘द्विज’, दिनकर, जानकीवल्लभ शास्त्री, नलिन विलोचन शर्मा जैसे कवि, लेखक, आलोचक भी बिहार से थे जिनके योगदान कों हिंदी साहित्य में स्वर्णक्षरों में अंकित किया जाता है।                          इस मौके पर ‘नई धारा’ की ओर से प्रो. पांडेय को उदयराज सिंह स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्हें एक लाख रूपये नकद, सम्मान पत्र, प्रतीक चिह्न, अंगवस्त्र आदि प्रदान किया गया।  ‘नई धारा’ के प्रधान संपादक डा. प्रमथराजं सिंह ने जानेमाने लेखक डा. मंगलमूर्ति (पटना), व्यंग्य लेखक एवं पत्रकार सुभाष राय (लखनऊ) तथा मराठी कवि एवं पत्रकार विजय चोरमारे (कोल्हापुर) को ‘नई धारा’ रचना सम्मान से सम्मानित करते हुए 25.25 हजार रूपये, सम्मान पत्र, प्रतीक चिह्न, अंगवस्त्र आदि प्रदान किये।