उज्जैन में अंतरराष्ट्रीय विराट गुरुकुल सम्मलेन

गुरुकुल शिक्षा को लेकर अभिभावकों की मानसिकता में बदलाव जरूरी -जोशी

उज्जैन । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने प्राचीन शिक्षा को युगानुकुल बनाने तथा समाज में गुरुकुल की परंपरा को लेकर अभिभावकों की मानसिकता में बदलाव लाने पर आज बल दिया।
              मध्यप्रदेश के उज्जैन स्थित राष्ट्रीय सांदीपनि वेदविद्या प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय विराट गुरुकुल सम्मलेन में दूसरे दिन‘ज्ञान यज्ञ’विषय पर सा को संबोधित करते हुए श्री जोशी ने कहा कि आज हमारे लिए आचार्य और उनकी संख्या समस्या नहीं है बल्कि छा चिंता का विषय हैं। कई छा गुरुकुल में पढ़ना नहीं चाहते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है, अभिभावकों की मानसिकता। उन्होंने कहा कि हमें सुनियोजित तरीके से अभिभावकों को जागरूक और प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है, जिससे कि वह गुरुकुल शिक्षण पद्धति को सम्मान और गौरव की भावना से देखें।
               उन्होंने गुरुकुल शिक्षण पद्धति को लेकर सकारात्मक वातावरण बनाने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि प्राचीन शिक्षा को युगानुकुल बनाना होगा।  हमें संख्या के साथ-साथ चिंतन पर भी विचार करना चाहिए। समाज के लोगों को सकारात्मक वातावरण बनाने की कोशिश करना चाहिए ताकि सरकार को इस दिशा में सोचे एवं इस दिशा में सहयोग करे। उन्होंने कहा कि हमारी हार्दिक कामना है कि वि गुरुकुल परंपरा को समझे और भारत उसका मार्गदर्शक बने।
                श्री जोशी ने कहा कि हमारे देश में गुरुकुल कभी भी सत्ता पोषित नहीं रहे है। प्राचीन काल से गुरुकुल समाज पोषित रहे हैं। वर्तमान समय में भी हमारी कोशिश होनी चाहिए कि समाज के लोग ही शिक्षा का पोषण करें। हमें सत्ता पर आश्रित न होकर स्वयं ही शिक्षा के स्वायत्तता के लिए कार्य करना होगा। समाज के लोगों को, देश के शिक्षाविदों को आगे बढ़कर सहयोग करने की आवश्यकता है जिससे शिक्षा स्वावलंबी एवं समृद्ध हो सके। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि आदि को लेकर नित्य प्रयोग करते रहने की आवश्यकता है। 
               श्री जोशी ने गुरु-शिष्य परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा, गुरु और शिष्य का संबंध परस्पर आत्मीयता का है। गुरु अपनी विराट कल्पनाओं की शक्ति शिष्य को समृद्ध बनाने में लगाता है, जिससे शिष्य सिर्फ ज्ञान ही प्राप्त नहीं करता बल्कि जीवन जीने की दृष्टि प्राप्त करता है और संस्कारों की शुद्धता प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि आज के जमाने में शिक्षा का व्यापारीकरण हो रहा है, शिक्षा बाजार की वस्तु हो गयी है। लेकिन हमारी परंपरा में शिक्षा दान का विषय रही है। आजकल लोग घर बैठे भी इंटरनेट पर शिक्षा प्राप्त करते हैं पर यह वास्तविक शिक्षा नहीं है। वास्तविक शिक्षा तो वह है जो जीवन को जानने वाली है।
              इस मौके पर मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव मनोज श्रीवास्तव ने गुरु-शिष्य परंपरा और दक्षिणा के संबंध में अपनी बात रखते हुए कहा कि गुरु की सच्ची दक्षिणा वही है, जिसमें शिष्य गुरु के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करे। हमारे शासों में कर्म को यज्ञ कहा गया है और यज्ञ की पूर्णाहुति दक्षिणा से संपन्न कराने की बात कही गयी है। श्री श्रीवास्तव ने कहा कि गुरुकुल शिक्षा सिर्फ जीवन का अंग नहीं है बल्कि स्वयं में जीवन है। आज शिक्षा ऋषि परंपरा नहीं बल्कि कृषि को भी संपोषित करने वाली है।
               इस मौके पर श्री सनत्कुमार ने प्रजेंटेशन के माध्यम से गुरुकुल परंपरा, वेद विद्या, योग पद्धति, गौ महिमा आदि को समझाया। वहीं श्री शैलेंद्र ने भारत के प्राचीन विविद्यालय तक्षशिला, नालंदा आदि के वैभवपूर्ण इतिहास के बारे में बताया। इस मौके पर माखनलाल चतुव्रेदी राष्ट्रीय पाकारिता एवं संचार विविद्यालय द्वारा प्रकाशित‘गुरुकुल समाचार’पा का विमोचन भी किया गया।