डा.सच्चिदानंद जोशी को संस्कृति रत्न अलंकरण अवार्ड  
 
भारतीय कला, संस्कृति, भाषा, विरासत को संरक्षित करने की हम सब की जिम्मेदारी - प्रो. सच्चिदानंद जोशी

उदयपुर। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सदस्य सचिव तथा प्रख्यात संस्कृतिकर्मी एवं लेखक डा.सचिच्दानंद जोशी को जनार्दन राय नागर विद्यापीठ डीम्ड विश्विद्यालय ने संस्कृति रत्न अलंकरण अवार्ड से सम्मानित किया है। डा.जोशी को यह अवार्ड कला व संस्कृति के क्षेत्र में उनके योगदान के लिये दिया गया है। इस अवसर पर डा.जोशी ने कहा कि भारतीय कला, संस्कृति, भाषा, विरासत को संरक्षित करने की हम सब की जिम्मेदारी है।
          जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड टू बी वि.वि. के 35वें स्थापना दिवस पर मंगलवार को प्रताप नगर स्थित आईटी सभागार में संस्थापक पं. जनार्दनराय नागर की स्मृति चिरस्थायी बनने के उद्देश्य से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र नई दिल्ली के सदस्य सचिव प्रो. सच्चिदानंद जोशी को पांचवा जनार्दनराय नागर संस्कृति रत्न अलंकरण से सम्मानित किया गया। उन्हें यह पुरुस्कार कुलाधिपति प्रो. बलवंत एस. जानी, कुलपति प्रो0 शिवसिंह सारंगदेवोत, कुल प्रमुख बी.एल. गुर्जर, राजस्थान विवि के कुलपति प्रो. राजीव जैन, रजिस्ट्रार डॉ0 हेमशंकर दाधीच ने प्रदान किया। यह पुरस्कार उन्हे भारतीय कला, संस्कृति व भाषा को संरक्षित करने एवं विरासत को बचाने में अपने दिये गये महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया। इसमें उन्हे प्रतीक चिन्ह, उपरणा, पगड़ी, प्रशस्ति पत्र व एक लाख रूपये का चेक दिया गया। 
              अलंकरण से सम्मानित प्रो. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि संस्कृति व संस्कार आत्मसात करने, संस्कृति व संस्कार जीवन में कही  न कही उस भावनात्मक बंधन में बांधने की चीज है जिस दिन में हम सब लोग इस दर्शन को समझ कर अपने विधार्थियों को इस दृष्टि से प्रेरित कर पायेगे, उस दिन भारत को विश्व गुरू बनाने के लिए ओर किसी साधना की आवश्यकता नहीं होगी। हमें हमारे देश को कश्मीर से कन्याकुमारी, कच्छ से कटक तक भौगोलिक आधार पर न मानकर भारत की अस्मियता, भारत का प्रबुद्ध व पूरा अस्तित्व भारत की प्रबध सांस्कृतिक विरासत पर टिका हुआ है क्योकि संस्कृति के धरातल पर ही शिक्षा का निर्माण संभव है। 
            जोशी ने कहा कि  शिक्षा कही से भी प्राप्त की जा सकती है, संस्कृति हमारे जीवन का मूल बोध तत्व है वह सिर्फ हमारे परिवेश, संस्कार और हमारी मात्रभूमि ही दे सकती है। दुर्भाग्य इस बात का है कि पिछले 70 वर्षो से इस देश के सबसे मजबूत पक्ष की गहरी अवहेलना की है। वह है हमारे भारतीय, सभ्यता, संस्कृति , संस्कार व जीवन मूल्य है इन्हे मजबूत कर ही हम भारत को पुनः सांस्कृतिक राष्ट्र बनाने में अपनी भूमिका अदा कर पायेगे। उन्होने कहा कि भारतीय संस्कृति अध्यात्म का चित्रण है, व्यक्ति के संस्कारों का अध्यात्मिक प्रदर्शन है प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने कहा कि पं. नागर ने मेवाड के सुदूर आदिवासी अंचल में शिक्षा की ज्योत जलाने का कार्य किया। शिक्षण व्यवस्थाओं को लेकर जनुभाई ने 85 वर्ष पहले जो कल्पना की थी  उसे वर्तमान सरकार द्वारा अब मूर्त  रूप दिया जा रहा है। साथ ही जनुभाई ने ऐसी संस्था बनाई जो भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के अनुरूप कार्य कर रही है। 
          उन्होंने कहा कि आज का दिन हमारे लिए अपने सामाजिक दायित्वों को पूर्ण परिभाषित करने का है जिन मूल्यों और उददेश्यों के लिए विद्यापीठ जैसी संस्थाओं का निर्माण हुआ है। लोकतंत्रात्मक प्रणालियों को सशक्त बनाने के लिए शिक्षा ही विकल्प है। गुणवत्ता सबसे महत्वपूर्ण होती है संस्थान को ब्राण्ड बनाने में इसी गुणवत्ता युक्त शिक्षा का योगदान होता है इसी से संस्थान की पहचान होती है। वर्तमान समय में हम तकनीक को नकार नहीं सकते हैं तकनीक ऐसी चीज है जिससे यदि आप रोजाना अपडेट नहीें रहेंगे तो आप पीछे रह जाए दें। कुलाधिपति प्रो. बलवंत एस. जानी ने कहा कि विश्व में भारत की सांस्कृतिक मूल्यों को स्थापित करने वाले स्वामी विवेकानंद युवाओं के हद्य में आज भी विद्यमान है और सदा रहेगे। विश्व मंच पर युवाओं को स्थापित करने के लिए हमें शिक्षा के साथ साथ हमें अपनी संस्कृति, संस्कार व स्वामी जी के जीवन मूल्यों को भी अपनाना होगा। वे भारत को एक ऐसा देश मानते थे  जहॉ आध्यात्म जीवित है और जहॉ से सम्पूर्ण विश्व में अध्यात्म का प्रचार प्रसार किया जा सकता है। अतीत से भविष्य का निर्माण होता है। हमें पूर्वजों से प्रेरणा लेकर आगे बढना चाहिए। 
            कुल प्रमुख भंवरलाल गुर्जर ने कहा कि स्थापना दिवस हमारे लिए आत्म चिंतन का अवसर है यह दिवस बीते दिनों में किए गए कार्यो के मूल्यांकन और दायित्वों का बोध एक साथ कराने का हैें क्यों कि अच्छे समाज को बनाने की जिम्मेदारी शिक्षा की है। विद्यापीठ समग्र ग्रामीण समुदाय के उत्थान के लिए कार्य कर रही है। जो कि संस्थापक जन्नु भाई का सपना था। उन्होंने कहा कि विद्यापीठ की नई पीढी को संकल्प के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक शिक्षा का कार्य करना है। संचालन डॉ0 हरीश चौबीसा ने किया। समारोह में विद्यापीठ के पूर्व कार्यकर्ता व राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के कुलपति प्रो. राजीव जैन, सुखाडिया विवि के डॉ0 अनिल कोठारी,  डॉ0 अनिल कुमार धोलकिया का शॉल, उपरणा, स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। वैश्विक महामारी कोरोना केा ध्यान में रखते हुए समारोह सभी विभागों के विभागाध्यक्ष, डीन, डायरेक्टर उपस्थित थे व कार्यकर्ता व शहर के गणमान्य नागरिक ऑन लाईन उपस्थित रहे।