नये भारत की नींव तैयार करेगी नई शिक्षा नीति : मोदी

  • इस शिक्षा नीति में  कैसे सोचना है पर बल दिया जा रहा है
  • 21वीं सदी के भारत से पूरी दुनिया को बहुत अपेक्षाएं हैं

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि नई शिक्षा नीति नये भारत की नींव तैयार करेगी। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति का उददेश्य नई पीढ़ी को भविष्य के लिये तैयार करना तथा उन्हें अपनी जड़ों से जोड़े रखने के साथ साथ वैश्विक नागरिक बनाना है। उन्होंने कहा कि भारत को ताकतवर बनाने के लिए, विकास की नई ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए, भारत के नागरिकों को और सशक्त करने के लिए, उन्हें ज्यादा से ज्यादा अवसरों के उपयुक्त बनाने के लिए नई शिक्षा नीति में विशेष जोर दिया गया है।
            प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज मानव संसाधन मंत्रालय तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर आयोजित एक वर्चु​अल सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। इस सम्मेलन में मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक व संजय धोत्रे भी शामिल थे।  उन्होंने कहा कि 3-4 साल के व्यापक विचार-विमर्श के बाद, लाखों सुझावों पर लंबे मंथन के बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति को स्वीकृत किया गया है। आज देश-भर में इसकी व्यापक चर्चा हो रही है। अलग-अलग क्षेत्र के लोग, अलग-अलग विचार-धाराओं के लोग, अपने विचार  दे रहे हैं, राष्ट्रीय शिक्षा नीति को  समीक्षा कर रहे हैं। ये एक  स्वस्थ चर्चा है, ये जितनी ज्यादा होगी, उतना ही लाभ देश की शिक्षा व्यवस्था को मिलेगा। ये भी खुशी की बात है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति आने के बाद देश के किसी भी क्षेत्र से, किसी भी वर्ग से ये बात नहीं उठी कि इसमें किसी तरह का पूर्वाग्रह है, या किसी एक ओर झुकी हुई है। ये एक  संकेत भी है कि लोग बरसों से चली आ रहे एजुकेशन सिस्टम में जो बदलाव चाहते थे, वो उन्हें देखने को मिले हैं।

        उन्होंने कहा कि कुछ लोगों के मन में ये सवाल आना स्वभाविक है कि इतना बड़ा  सुधार कागजों पर तो कर दिया गया, लेकिन इसे जमीन पर कैसे उतारा जाएगा। यानि अब सब की निगाहें इसके  क्रिन्यावयन की तरफ हैं। इस चैलेंज को देखते हुए, व्यवस्थाओं को बनाने में जहां कहीं कुछ सुधार की आवश्यकता है, वो हमें सबको मिलकर ही करना है और करना ही है।  उन्होंने शिक्षा जगत से जुड़े लोगों से कहा कि आप राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रिन्यावयन से सीधे तौर पर जुड़े हैं और इसलिए आपकी भूमिका बहुत ज्यादा अहम है। उन्होंने आश्वस्त किया कि जहां तक राजनीतिक इच्छाशक्ति की बात है, मैं पूरी तरह प्रतिबद्ध हूं और हर तरह से आपके साथ हूं।

         उन्होंने कहा कि  हर देश, अपनी शिक्षा व्यवस्था को अपनी  राष्ट्रीय मूल्यों के साथ जोड़ते हुए, अपने  राष्ट्रीय उददेश्यों के अनुसार सुधार करते हुए चलता है। मकसद ये होता है कि देश का  शिक्षा व्यवस्था, अपनी वर्तमान औऱ आने वाली पीढ़ियों को  भविष्य के लिये तैयार  करे। भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति का आधार भी यही सोच है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 21वीं सदी के भारत की, नए भारत की  आधार तैयार करने वाली है। 21वीं सदी के भारत को, हमारे युवाओं को जिस तरह की  शिक्षा चाहिए, जैसी  क्षमता चाहिए, राष्ट्रीय शिक्षा नीति उस पर फोकस करती है।

         उन्होंने कहा कि भारत को ताकतवर बनाने के लिए, विकास की नई ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए, भारत के नागरिकों को और सशक्त करने के लिए, उन्हें ज्यादा से ज्यादा अवसरों के उपयुक्त बनाने के लिए, इस एजुकेशन पॉलिसी में खास जोर दिया गया है। जब भारत का  छात्र, चाहे वो नर्सरी में हो या फिर कॉलेज में,  वैज्ञानिक तरीके से पढ़ेगा, तेजी से बदलते हुए समय और तेजी से बदलती जरूरतों के हिसाब से पढ़ेगा, तो वो  राष्ट्र निर्माण में भी रचनात्मक भूमिका निभा पाएगा।

        उन्होंने कहा कि बीते अनेक वर्षों से हमारे  शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव नहीं हुए थे। परिणाम ये हुआ कि हमारे समाज में जिज्ञासा और परिकल्पनाओं के मूल्य को प्रमोट करने के बजाय भेड़ चाल को प्रोत्साहन मिलने लगा था। कभी डॉक्टर बनने के लिए होड़ लगी, कभी इंजीनियर बनाने की होड़ लगी, कभी वकील बनाने की होड़ लगी।  रुचि, क्षमता व मांग का आकलन  किए बिना होड़ लगाने की प्रवृत्ति से  शिक्षा को बाहर निकालना ज़रूरी था। हमारे  छात्रों में, हमारे युवाओं में महत्वपूर्ण सोच और नवीन सोच विकसित कैसे हो सकती है, जब तक हमारी शिक्षा में जुनून ना हो,  शिक्षा का दर्शन, शिक्षा का उद्देश्य ना हो।

     उन्होंने गुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए कहा कि गुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर कहते थे कि “उच्चतम शिक्षा वो है जो हमें सिर्फ जानकारी ही नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सद्भाव में लाती है।“ उन्होंने कहा कि  निश्चित तौर पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति का बृहद लक्ष्य इसी से जुड़ा है। इसके लिए टुकड़ों में सोचने के बजाय एक समग्र दृष्टिकोण की ज़रूरत थी, जिसको सामने रखने में राष्ट्रीय शिक्षा नीति सफल रही है।

 उन्होंने कहा कि आज जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति मूर्त रूप ले चुकी है, तो मैं उस समय और सवालों की भी चर्चा आपसे करना चाहता हूं, जो हमारे सामने शुरुआती दिनों में आए थे। उस समय जो दो सबसे बड़े सवाल थे, वो यही थे कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था हमारे युवाओं को रचनात्मक जिज्ञासा और प्रतिबद्धता प्रेरित जीवन के लिए  प्रोत्साहित करती है? उन्होंने शिक्षा जगत के लोगों से सवाल किया कि आप लोग इस क्षेत्र में इतने वर्षों से हैं। इसका जवाब बेहतर जानते हैं।

     उन्होंने कहा कि हमारे सामने दूसरा सवाल था कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारे युवाओं को  सशक्त करती है, देश में एक  सशक्त समाज के निर्माण में मदद करती है? आप सब इन सवालों से भी परिचित हैं और जवाबों से भी परिचित हैं। उन्होंने कहा कि आज  संतोष है कि भारत की नेशनल एजुकेशन पॉलिसी- राष्ट्रीय शिक्षा नीति को बनाते समय, इन सवालों पर गंभीरता से काम किया गया।

     उन्होंने कहा कि  बदलते समय के साथ एक नई विश्व व्यवस्था, एक नए रंग-रूप और व्‍यवस्‍थाओं में बदलाव, एक नई विश्‍व व्‍यवस्‍था खड़ी हो रही है। एक नया  वैश्विक मानक भी तय हो रहा है। इसके हिसाब से भारत का एजुकेशन सिस्टम खुद में बदलाव करे, ये भी किया जाना बहुत जरूरी था।  स्कूल पाठयक्रम के 10+2  ढांचे से आगे बढ़कर अब 5+3+3+4  पाठयक्रम का  ढांचा देना, इसी दिशा में एक कदम है। हमें अपने  छात्रों को  को  वैश्विक नागरिक भी बनाना है और इसका भी ध्यान रखना है कि वे  वैश्विक नागरिक तो बने लेकिन साथ-साथ अपनी जड़ों से भी जुड़े रहें। जड़ से जग तक, मनुज से मानवता तक, अतीत से आधुनिकता तक, सभी बिंदुओं का समावेश करते हुए, इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति का स्वरूप तय किया गया है।

         उन्होंने कहा कि इस बात में कोई विवाद नहीं है कि बच्चों के घर की बोली और स्कूल में पढ़ाई की भाषा एक ही होने से बच्चों के सीखने की गति बेहतर होती है। ये एक बहुत बड़ी वजह है जिसकी वजह से जहां तक संभव हो,  पांचवी कक्षा तक, बच्चों को उनकी मातृभाषा में ही पढ़ाने पर सहमति दी गई है। इससे बच्चों की नींव तो मजबूत होगी ही, उनकी आगे की पढ़ाई के लिए भी उनका  आधार और मजबूत होगा।

        उन्होंने कहा कि अभी तक जो हमारी शिक्षा व्यवस्था है, उसमें  क्या सोचना है पर फोकस रहा है। जबकि इस शिक्षा नीति में  कैसे सोचना है पर बल दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आज जिस दौर में हम हैं, वहां  सूचना  और  सामग्री की कोई कमी नहीं है। एक प्रकार से बाढ़ आयी हुई है, हर प्रकार की जानकारी आपके मोबाइल फोन पर  उपलब्ध है। जरूरी ये है कि कौन सी जानकारी हासिल करनी है, क्या पढ़ना है। इस बात को ध्यान में रखकर ही, राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रयास किया गया है कि जो पढ़ाई के लिए लंबा-चौड़ा  पाठयक्रम होता है, ढेर सारी किताबें होती हैं, उसकी अनिवार्यता को कम किया जाए। अब कोशिश ये है कि बच्चों को सीखने के लिए  पूछताछ-आधारित, डिस्कवरी-आधारित, चर्चा आधारित और विश्लेषण आधारित तरीकों पर जोर दिया जाए। इससे बच्चों में सीखने की ललक बढ़ेगी और उनके क्लास में उनका भागीदारी  भी बढ़ेगा।

    उन्होंने कहा कि हर विद्यार्थी को,  छात्र को ये अवसर मिलना ही चाहिए कि वो अपने  जुनून को  अनुसरण  करे। वो अपनी सुविधा और ज़रूरत के हिसाब से किसी डिग्री या कोर्स को   अनुसरण कर सके और अगर उसका मन करे तो वो छोड़ भी सके। अक्सर ऐसा होता है कि कोई  कोर्स करने के बाद  छात्र जब  नौकरी के लिए जाता है तो उसे पता चलता है कि जो उसने पढ़ा है वो  नौकरी की  आवश्यकता को पूरा नहीं करता। कई  छात्रों को अलग-अलग वजहों से बीच में ही  कोर्स छोड़कर  नौकरी करनी पड़ती है। ऐसे सभी  छात्रों की जरूरतों का खयाल रखते हुए  एकाधिक प्रवेश-निकास का विकल्प दिया गया है। अब छात्र वापस अपने कोर्स से जुड़कर अपनी  नौकरी की आवश्यकता के हिसाब से ज्यादा  प्रभावी तरीके से पढ़ाई कर सकता है, पढाई कर सकता है।  

     प्रधानमंत्री ने कहा कि छात्रों को ये भी स्वतंत्रता होगी कि अगर वो कोई कोर्स बीच में छोड़कर दूसरे कोर्स में प्रवेश लेना चाहें तो कर सकते हैं। इसके लिए वो पहले कोर्स से एक निश्चित समय तक ब्रेक ले सकते हैं और दूसरा कोर्स  शुरु कर सकते हैं।  उच्च शिक्षा  को,  स्ट्रीम से मुक्त करने,  एक से अधिक प्रवेश व निकास ,  क्रेडिट बैंक के पीछे यही सोच है। हम उस  युग की तरफ बढ़ रहे हैं जहां कोई व्यक्ति जीवन भर किसी एक प्रोफेशन में ही नहीं टिका रहेगा, बदलाव निश्चित है, यह मानकर रहिए। इसके लिए उसे निरंतर खुद को फिर से कौशल और अप-कौशल करते रहना होगा। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी- राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसका भी ध्यान रखा गया है।

          उन्होंने कहा कि किसी भी देश के विकास में एक बड़ी भूमिका रहती है- समाज के हर तबके की गरिमा, उसकी  गौरव. समाज का कोई व्‍यक्ति कोई भी काम करता हो, कोई निम्‍न नहीं होता। हमें ये सोचना चाहिए कि भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रहे देश में यह बुराई कहां से आई। ऊंच-नीच का भाव, मेहनत-मजदूरी करने वालों के प्रति हीन भाव इस प्रकार की विकृति हमारे अंदर कैसे घर कर गई।  इसकी एक बड़ी वजह रही कि हमारी एजुकेशन का समाज के इस तबके के साथ एक तरह का जुडाव नहीं रहा।  जब गांवों में जाएंगे, किसान को, श्रमिकों को, मजदूरों को काम करते देखेंगे, तभी तो उनके बारे में जान पाएंगे, उन्हें समझ पाएंगे, वे कितना बड़ा योगदान कर रहे हैं, समाज की आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए वे कैसे अपना जीवन खपा रहे हैं। उनके श्रम का सम्मान करना हमारी पीढ़ी को सीखना ही होगा। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति में  छात्र शिक्षा और  श्रमिकों के गौरव पर बहुत ध्‍यान दिया गया है।

           उन्होंने कहा कि 21वीं सदी के भारत से पूरी दुनिया को बहुत अपेक्षाएं हैं। भारत का सामर्थ्य है कि वो टैलेंट और टेक्नॉलॉजी का समाधान पूरी दुनिया को दे सकता है। हमारी इस जिम्मेदारी को भी हमारी  शिक्षा नीति पालन करती है।  राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जो भी समाधान सुझाए गए हैं, उससे  भविष्य की प्रोद्योगिकी के प्रति एक माइंडसेट विकसित करने की भावना है। अब टेक्नोलॉजी ने हमें बहुत तेजी से, बहुत अच्छी तरह से, बहुत कम खर्च में, समाज के आखिरी छोर पर खड़े छात्रों तक पहुंचने का माध्यम दिया है। हमें इसका ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना है।

      प्रधानमंत्री ने कहा कि इस  शिक्षा नीति के माध्यम से  प्रोद्योगिकी आधारित बेहतर कान्टेंन्ट  और  कोर्स के डेवलमेंट में बहुत मदद मिलेगी।  बेसिक कम्पयूटिंग पर बल हो,  कोडिंग पर फोकस हो या फिर रिसर्च पर ज्यादा जोर, ये सिर्फ एजुकेशन सिस्टम ही नहीं बल्कि पूरे समाज की अप्रोच को बदलने का माध्यम बन सकता है। वर्चुअल लैब जैसे कॉन्सेप्ट ऐसे लाखों साथियों तक बेहतर शिक्षा के सपने को ले जाने वाला है, जो पहले ऐसे  विषय पढ़ ही नहीं पाते थे जिसमें  प्रयोगशाला में प्रयोग जरूरी हो। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी- राष्ट्रीय शिक्षा नीति, हमारे देश में  शोध और  शिक्षा  के गैप को खत्म करने में भी अहम भूमिका निभाने वाली है।

         मोदी ने कहा कि जब  संस्थाओं और  बुनियादी सुविधाओं में भी ये  सुधार दिखाई देंगे तभी राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अधिक प्रभावी और त्वरित गति से  क्रिन्यान्वित किया जा सकेगा। आज समय की मांग है कि  नवाचार व अनुकूलन  की जो  मूल्य हम समाज में निर्मित करना चाहते हैं, वो खुद हमारे देश के  संस्थानों से शुरु होनी चाहिए जिसका नेतृत्‍व आप सबके पास है। जब हम  शिक्षा और विशेषकर  उच्च शिक्षा को  सशक्त समाज के निर्माता के रूप में खड़ा करना चाहते हैं तो इसके लिए  उच्च शिक्षा संस्थानों को भी  सशक्त करना ज़रूरी है।  उन्होंने कहा कि  जैसे ही  संस्थानों को  सशक्त करने की बात आती है, उसके साथ एक और शब्द चला आता है-  स्वायत्ता।  स्वायत्ता को लेकर हमारे यहां दो तरह के मत रहे हैं। एक कहता है कि सब कुछ सरकारी नियंत्रण से, पूरी सख्ती से चलना चाहिए, तो दूसरा कहता है कि सभी संस्थानों को  स्वायत्ता मिलनी चाहिए।

         उन्होंने कहा कि अप्रोच में  गैर सरकारी संस्थानों के प्रति  गैर विश्वास दिखता है तो दूसरी अप्रोच में  स्वायत्ता को  पात्रता के रूप में ट्रीट किया जाता है।  उच्च गुणवत्ता शिक्षा का रास्ता इन दोनों मतों के बीच में है। जो संस्थान  गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए ज्यादा काम करे, उसको ज्यादा स्वायत्ता से पुरुस्कृत  किया जाना चाहिए। इससे  गुणवत्ता को प्रोत्साहन मिलेगा और सबको  आगे बढने करने के लिए  प्रोत्साहन भी मिलेगा। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी- राष्ट्रीय शिक्षा नीति आने से पहले, हाल के वर्षों में आपने भी देखा है कि कैसे हमारी सरकार ने अनेकों संस्थान   को ऑटोनॉमी देने की पहल की है।  उन्होंने उम्मीद जताई कि  राष्ट्रीय शिक्षा नीति का जैसे-जैसे विस्तार होगा, शिक्षा संस्थानों को ऑटोनॉमी की प्रक्रिया भी और तेज होगी।

      उन्होंने कहा कि देश के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक, डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम कहा करते थे-  शिक्षा का उद्देश्य कौशल और विशेषज्ञता के साथ अच्छे इंसान बनाना है ... प्रबुद्ध मानव शिक्षकों द्वारा बनाया जा सकता है। प्रधाानमंत्री ने कहा कि  वाकई, शिक्षा व्यवस्था में बदलाव, देश को अच्छे  छात्रों, अच्छे प्रोफेशनल्स और उत्तम नागरिक देने का बहुत बड़ा माध्यम  सभी  शिक्षक ही हैं, प्रोफेसर्स ही हैं। शिक्षा जगत से जुड़े   लोग इस काम को करते हैं और कर सकते हैं। इसलिए नेशनल एजुकेशन पॉलिसी- राष्ट्रीय शिक्षा नीति में  शिक्षकों के गौरव का भी विशेष ध्यान रखा गया है। एक प्रयास ये भी है कि भारत का जो टेलेंट है, वो भारत में ही रहकर आने वाली पीढ़ियों का विकास करे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में  शिक्षकों के प्रशिक्षण पर बहुत जोर है, वो अपनी  स्किल लगातार अपडेट करते रहें, इस पर बहुत जोर है। मुझे विश्वास है, जब एक शिक्षक सीखता है, एक राष्ट्र का नेतृत्व होता है।

         उन्होंने कहा कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी- राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अमल में लाने के लिए हम सभी को एक साथ संकल्पबद्ध होकर काम करना है। यहां से  विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, स्कूल शिक्षा बोर्डों, अलग-अलग  राज्यों, अलग-अलग  हितधारकों के साथ संवाद और समन्वय का नया दौर शुरु होने वाला है। आप सभी साथी क्योंकि  उच्च शिक्षा के सबसे शीर्ष संस्थानों के शीर्ष में है, तो आपकी जिम्मेदारी ज्यादा है। मेरा आग्रह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर लगातार वेबीनार करते रहिए,  संवाद करते रहिए। नीति के लिए रणनीति बनाइए, रणनीति के बात को लागू करने के लिए रोडमैप, रोडमैप के साथ  टाइमलान जोडि़ए, उसको  क्रिन्यानिवत करने के लिए  संसाधन व मानव संसाधन, ये सबको जोड़ने की योजना बनाइए और ये सारा चीज़ नई नीति के प्रकाश में आपको करना है।  

         उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति सिर्फ एक सर्कुलर नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति सिर्फ सर्कुलर जारी करके, नोटिफाई करके  क्रियान्वित नहीं होगी। इसके लिए मन बनाना होगा, आप सभी को दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी। भारत के वर्तमान और भविष्य को बनाने के लिए आपके लिए ये कार्य एक महायज्ञ की तरह है। इसमें आपका योगदान बहुत आवश्यक है, इस कॉन्क्लेव को देख रहे, सुन रहे प्रत्येक व्यक्ति का योगदान आवश्यक है।  उन्होंने विश्वास जताया कि कि इस  सम्मेलन  में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के  प्रभावी क्रिन्यावयन  को लेकर बेहतर सुझाव, बेहतर समाधान निकलकर आएंगे। उन्होंने नई शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिये डा कस्तूरीरंगन व उनकी टीम का आभार व्यक्त किया।