स्कूल - मानसिक कल्याण के लिए सर्वोपरि स्थल : संजय धोत्रे

 

संजय धोत्रे

मानव संसाधन विकास मंत्रालय, इलेक्ट्रानिक्स एंड इनर्फोमेंशन तथा संचार राज्य मंत्री

एक वायरस ने पिछले कुछ महीनों से मानव जीवन को पूरी तरह से अस्त व्यस्त कर दिया है, जिसके प्रकोप का संभवत: हमारे बीते  अनुभवों में कोई समकक्ष नहीं है। एक सदी से भी अधिक समय पहले सन 1918 में, जब हम में से अधिकांश का जन्म भी नहीं हुआ था इसी प्रकार के एक संक्रामक रोग, स्पैनिश फ़्लू ने विश्व को संतप्त कर दिया था। पिछले सौ वर्षों के दौरान चिकित्सा में हुए विकास ने हमें इस घातक वायरस के शिकंजे से अधिकांश जीवनों को बचाने में सक्षम बनाया है। हमारे शोधकर्ता भी इस घातक उप-सूक्ष्मजीव से लड़ने के लिए इलाज खोजने के साथ-साथ इसका टीका तैयार करने लिए निरंतर प्रयासरत हैं। किन्तु, हमें यह मानना होगा कि यह   वायरस न केवल हमें शारीरिक रूप से प्रभावित कर रहा है बल्कि इसने हमें काफी गहरी चोट पहुंचाई है। 

काफी लंबे समय से लॉकडाउन चल रहा है। लॉकडाउन के आंशिक रूप से खुलने के बाद भी, हम में से अधिकतर लोग अपने घर तथा उसके आस पास तक ही सीमित हैं। शैक्षिक संस्थान केवल वर्चुअल मोड में काम कर रहे हैं और मनोरंजन के सार्वजनिक स्थान या तो बंद हैं या वहाँ बहुत ही कम आवाजाही है। कई अन्य विकसित देशों में स्थिति को देखते हुए, हम इस घातक वायरस के प्रकोप को रोकने में काफी सफल रहे हैं। फिर भी, हमारे आस-पास की दुनिया वह नहीं है जो हमेशा हुआ करती थी। इस बीमारी से चारों ओर फैली निरंतर अनिश्चितता से भय, चिंता और भावनात्मक पीड़ा हो सकती है। हमारे पास संक्रमित, ठीक हुए और मृत लोगों की संख्या से संबंधित वास्तविक आंकड़े हैं, किन्तु हम शायद अपने लोगों को हो रही भावनात्मक-मनोवैज्ञानिक क्षति से पूरी तरह से वाकिफ नहीं हैं।

वास्तव में, पिछले कई दशकों के दौरान अपने लोगों के लिए अच्छा   मानसिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करने में हमारी प्रगति अधिक संतोषजनक नहीं रही है। अतीत से ही, हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति शारीरिक कल्याण सुनिश्चित करने पर केन्द्रित रही है। एक समाज के रूप में भी, हम मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को काफी हद तक अनदेखा करते रहे हैं अथवा टालते रहे हैं बल्कि हमने मस्तिष्क से संबंधित रोगों को लांछित भी किया है। हाल के वर्षों में, सरकार द्वारा चलाए गए निरंतर जन जागरूकता अभियानों के कारण यह लांछन समाप्त हुआ है और अब बड़े पैमाने पर लोग इसे एक समस्या के रूप में पहचानने लगे हैं, जिसे विशेषज्ञों द्वारा उपचार की आवश्यकता है। हमने पिछले कुछ वर्षों के दौरान आम लोगों को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल उपलब्ध कराने में काफी प्रगति की है। लेकिन मानसिक कल्याण सुनिश्चित करने के लिए, हम केवल  नैदानिक ​​देखभाल पर निर्भर नहीं कर सकते; हमें और अधिक बुनियादी रूप से इस पर कार्य करना होगा। हमें ऐसे संकटों से निपटने के लिए निवारक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। हमारी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू बच्चों के सर्वांगीण विकास, जिसमें मजबूत मानसिक स्वास्थ्य शामिल है, के माध्यम से स्कूल के स्तर पर इन मुद्दों का समाधान करना होगा।

यह समझना कठिन नहीं है कि आज के बच्चे मानसिक और भावनात्मक तनाव के प्रति काफी संवेदनशील हैं। इसके पीछे छोटे एकल परिवार, कई मामलों में भाई-बहनों का न होना, सीमित  सामुदायिक मिलना-जुलना, सुस्त जीवन शैली, अस्वास्थ्यकर आहार की आदत, आक्रामक रूप से प्रतिस्पर्धी बनने तथा समय से पूर्व परिपक्वता दिखाने के लिए दबाव, अभिभावकों का ध्यान न दे पाना, तंग किया जाना, सर्वव्यापी दृश्य मीडिया द्वारा प्रसारित हिंसक चित्रों का प्रभाव, आदि इत्यादि जैसे कई कारण हो सकते हैं।

अत:, हमें अपने स्कूलों को इस तरह से व्यवस्थित करने की आवश्यकता है कि इन मुद्दों को गहन संवेदना के साथ समझा जाए और प्रत्येक बच्चे की सीखने की क्षमता की सराहना की जाए और उसका पूर्ण रूप से पोषण किया जाए। यह महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक बच्चे को एक स्वावलंबी (आत्मनिर्भर) व्यक्ति के रूप में विकसित होने में सक्षम बनाया जाए। तथापि, परस्पर निर्भरता को भी दृढ़ता  से पोषित किया जाना चाहिए। स्कूल स्थलों को सर्व-समावेशी होना चाहिए। हर बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि लिंग, सामाजिक-आर्थिक वर्ग, जातीयता, घर में बोली जाने वाली भाषा, विकलांगता, माता-पिता की शिक्षा, आदि के भेदभाव के बिना उसे समान अवसर दिया गया है। विविधता को स्वीकार करना चाहिए और वृहत दुनिया के साथ बच्चों को जोड़ने के लिए एक अवसर के रूप में इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सहयोगात्मक शिक्षा और अन्वेषण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और पारस्परिक रूप से अनन्य प्रतिस्पर्धा के विचार को सक्रिय रूप से त्यागना चाहिए। उत्कृष्टता, सर्वोत्तम होने का पर्याय नहीं होना चाहिए। हमारे स्कूलों तथा  अभिभावकों को भी बच्चों के लिए स्वावलंबन (आत्मनिर्भरता) और अन्योन्यालंवन (परस्पर निर्भरता) के बीच एक अच्छा संतुलन प्राप्त करने की दिशा में काम करना चाहिए।

पाठ्यक्रम आदान-प्रदान के एक भाग के रूप में, बच्चों को संगीत सुनने और अन्य कला रूपों की सराहना करने जैसे विभिन्न प्रकार के सौंदर्य अनुभवों के प्रति संवेदनशील बनाना चाहिए। उन्हें प्रकृति के साथ आत्मीयता विकसित करने और इसकी असंख्य और स्तरित अभिव्यक्तियों की सराहना करने में मदद मिलनी चाहिए। पठन, ऐसी  एक और अनिवार्य गतिविधि है जिसमें हर बच्चे की रूचि बढ़ाने के लिए उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। पठन की क्रिया के दौरान सापेक्ष एकांत में बैठे-बैठे बच्चे कई स्थानों के बारे में जान सकते हैं और भिन्न-भिन्न समय और स्थानों पर विविध मानव अनुभवों की जानकारी प्राप्त कर सकते है। नि:संदेह, इससे उनकी कल्पना और रचनात्मकता बढ़ेगी। योग और खेल, स्कूल पाठ्यक्रम का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। इन पर नए सिरे से फोकस दिया जाना चाहिए क्योंकि ये शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उपर्युक्त सभी कार्यकलाप दृढ़ता, नम्यता, मस्तिष्क की गंभीरता, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता, टीम भावना, विफलताओं को स्वीकार करने की क्षमता आदि जैसे महत्वपूर्ण लक्षणों का पोषण करते हैं। योग आध्यात्मिक कायाकल्प, अव्यक्त ऊर्जाओं की उन्मुक्तता और उनकी सकारात्मक चैनलाइज़ेशन में एक विशिष्ट भूमिका निभाता है।  

इन पाठ्यक्रम गतिविधियों के साथ-साथ, हमारे पास उपचारात्मक उपाय तैयार होने चाहिए। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण है काउंसिलिंग जिसे स्कूली जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाना चाहिए। प्रारंभिक अवस्था में अवसाद और अलगाव के संकेतों को समझने के लिए काउंसिलिंग आवश्यक है। फिर बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को बहाल करने के लिए बचाव के उपाय किए जा सकते हैं। किशोरावस्था से संबंधित मुद्दों और करियर के लिए भी काउंसिलिंग आवश्यक है।

इन मुद्दों पर हमारे नीति दस्तावेज़ काफी स्पष्ट हैं। फिर भी, मूल वास्तविकता अधिक प्रेरणादायक नहीं है। यदि हम अपने बच्चों का समग्र विकास चाहते हैं, यदि हम सक्षम और मजबूत भावी नागरिक पाने की इच्छा रखते हैं, तो सभी हितधारकों को नए जोश के साथ और ऐसे लक्ष्यों के प्रति मिलकर काम करना होगा। हमें यह भी समझना चाहिए कि महामारी या ऐसे संकट एक निश्चित पैटर्न या चक्र को प्रतिबिंबित नहीं कर सकते हैं। हम भविष्य की अनिश्चितताओं की थाह नहीं ले सकते। इसलिए, हमारे बच्चों को प्रकृति की ऐसी विलक्षणताओं का सामना करने और उनके अनुसार स्वयं को ढालने के प्रति मनो-भावनात्मक रूप से तैयार होना चाहिए। हम सही अर्थों में तब ही आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे जब हमारे बच्चे स्वावलंबी और खुशहाल व्यक्तियों का  सौहार्दपूर्ण समुदाय बना पाएंगे। 

:-  लेखक संजय धोत्रे भारत सरकार में राज्य मंत्री हैं और उनके पास मानव संसाधन विकास मंत्रालय, इलेक्ट्रानिक्स एंड इनर्फोमेंशन तथा संचार मंत्रालय में राज्य मंत्री का प्रभार है।