लॉकडाउन : शिक्षा को लेकर चिंताएं भी और चुनौतियां भी


विनोद बब्बर


            भारत की प्रतिभा, मेधा किसी भी चुनौती को अवसर में बदलने की अपनी क्षमता को बार बार सिद्ध कर चुकी है इसलिए इस बात में कोई संदेह नहीं कि आने वाला समय भारत का होगा। लंबे लॉकडाउन से शिक्षा में आये व्यवधान को लेकर निश्चित तौर पर चिंताएं हैं। पिछड़े क्षेत्रों में जहां दसवीं तक पहुंचते पहुंचते स्कूल छूटने की दर पहले ही असामान्य है वहां स्थिति और बदतर हो सकती है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पिछले आंकड़ों के अनुसार असम में 33.7 प्रतिशत,  बिहार में 32 प्रतिशत, ओडिशा में 28.3 प्रतिशत, कर्नाटक में 24.3 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 24.2 प्रतिशत, आन्ध्रपदेश में 22.9 प्रतिशत,  छत्तीस गढ़ में 21.4 प्रतिशत,  उत्तर प्रदेश में 19 प्रतिशत,  और देश की राजधानी दिल्ली में 17.5 प्रतिशत छात्रों का स्कूल छूटता है। राजनीति के दावे अपनी जगह लेकिन इस स्थिति में कोई बड़ा बदलाव हुआ हो ऐसा कोई कारण दिखाई नहीं देता। वर्तमान कोरोना काल की चुनौतियां इस दर को बढ़ाने में सहायक हो सकती है। 
          सब जानते हैं हमारे समाज के निम्न मध्यम परिवार में बच्चा किसी न किसी रूप में परिवार का सहायक (हैल्पिंग हैंड) होता है। परिवार पर आया कोई संकट बच्चे से उसका बचपन छीन सकता है। बाल श्रम पर लाख प्रतिबंध हो लेकिन देश का शायद ही कोई भाग ऐसा होगा जहां अव्यस्क बच्चे चाय की दुकान, होटल, पर बर्तन धोते नजर न आये। रेहड़ी पटरी वालों के बच्चे तो अक्सर माता पिता की मदद करते नजर आते ही है। कुछ बच्चे स्कूल के बाद परिवार का आर्थिक सहयोग करने के लिए कुछ करते नजर आते हैं। इन आंकड़ों में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे शामिल नहीं हो पाते या नहीं किये जाते। जहां तक वर्तमान संकट का सवाल है, हम देख ही रहे हैं अपने परिवार के साथ नगरो, महानगरों, औद्योगिक नगरों में रहने वाला श्रमिक वर्ग बड़ी संख्या में अपने गांवों में लौटा है। आशा है स्थिति सामान्य होने के बाद वे लौट जायेंगे। लेकिन उनके बच्चों की पढ़ाई बाधित होना तय है।
           ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे किसान परिवारों के  एक दो सदस्य शहर में प्राईवेट नौकरी या छोटा मोटा कामकाज करते है। उन पर भी संकट है। अतः वे परिवार जिनके बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं, उनके लिए खर्च वहन करना कितना संभव होगा, इसे भी देखना होगा। अधिकांश क्षेत्रो में सत्र आरंभ होने पर बच्चे को पुस्तके आदि दिलाकर पूरे साल की फीस आदि दे दी जाती है लेकिन इस बार यह क्रम बाधित हुआ। केवल ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं महानगरों में भी। देश की राजधानी दिल्ली की अनाधिकृत कालोनियों में सरकारी विद्यालय कम हैं और जो हैं भी वहां शिक्षा का स्तर राजनैतिक प्रचार को एक तरफ रखते हुए देखे कि वास्तव में क्या है तो हम छोटे छोटे निजी विद्यालयों की बड़ी संख्या का कारण समझ सकते हैं। इन क्षेत्रों में रहने वाले जो अभिभावक सामान्य स्थिति में भी स्कूल फीस नियमित रूप से नहीं दे पाते वे इस असामान्य स्थिति में क्या करें, कैसे करेंगे और उसके परिणाम अनुमान लगाया जा सकता है।
            आमतौर पर माना जाता है कि सभी निजी स्कूल मोटी कमाई करते हैं। इसलिए निजी स्कूलों को फीस नहीं लेनी चाहिए। जबकि वास्तविकता यह है कि कुछ नामी स्कूलों की फीस और अनाधिकृत कालोनियों के छोटे स्कूलों की फीस व अन्य खर्चो में आश्चर्यजनक रूप से भारी अंतर होता है। नामी स्कूलों को दाखिले के समय ही बहुत कुछ प्राप्त हो जाता है। वहां अनेक तरह के शुल्क भी होते हें जबकि छोटे छोटे स्कूलों में केवल फीस मिलना भी आसान नहीं होता। इसलिए सब स्कूलों को एक नजर से नहीं देखा जा सकता। कमजोर अभिभावकों की स्थिति का प्रभाव उनके बच्चों और इन स्कूलों पर पड़ना तय है। अतः स्कूल ड्रॉप में वृद्धि हो तो उसे आश्चर्य न होगा। 
          अब प्रश्न यह कि समाधान क्या है? बिना फीस लिए शायद बड़े स्कूल अपने शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों को वेतन आदि दे सके परंतु छोटे स्कूल इस स्थिति में होंगे यह सोचना भी गलत है। यह कहना भी ‘आई वॉश’ होगा कि इन सभी बच्चों को पास के सरकारी स्कूल में दाखिला दिया जा सकता है। विचारणीय है कि यदि वहां सब ठीक होता तो निजी स्कूलों की जरूरत ही क्यों पड़ती। यहां हमारा इरादा निजी स्कूल प्रबंधन का पक्ष प्रस्तुत करना नहीं अपितु वास्तविक स्थिति को सामने लाना है। क्योंकि हमारी प्राथमिकता स्कूल छोड़ने वालो की संख्या को कम कर शून्य पर लाने की थी लेकिन उलट आसान की आशंका भयभीत करती है। क्या स्तरीय शिक्षा के बिना भारत वर्तमान चुनौती को अवसर में बदल सकता है? क्या शिक्षा को राजनीति प्रचार से मुक्त कर सर्वोच्च प्राथमिकता देना किसी सरकार के एजेंडे में हैं? 
           इन दिनों ऑनलाइन शिक्षा की बहुत चर्चा है लेकिन यह कितनी व्यवहारिक है, कितनी प्रभावी है इसे भी देखना होगा। विशेष यह कि बिना अनुभव, हडबड़ी, जल्दबाजी में आजकल ऑन लाइन शिक्षा के नाम पर जो कुछ हो रहा है उसका छोटे छोटे बच्चों पर कितना सकारात्मक और कितना नकारात्मक प्रभाव हो सकता है उसे भी ध्यान में रखना होगा। महत्वपूर्ण यह कि किसी भी कीमत पर एक भी बच्चे के स्कूल छूटने की स्थिति नहीं आनी चाहिए। शिक्षा के नाम पर औपचारिकता भी नहीं होनी चाहिए। शिक्षा का अर्थ कागजी प्रमाणपत्र नहीं, ज्ञान होता है। वह ज्ञान जो जीव को मनुष्य बनाकर उसे अपने लिए, अपनों के लिए और अपने समाज राष्ट्र के लिए उपयोगी बने। वह ज्ञान जो उसे सक्षम, सबल और आत्मनिर्भर स्वाभिमानी नागरिक बनाने में अपनी भूमिका सुनिश्चित कर सके। इस संकट के समय बड़ी चिंता यह भी हो कि किसी बच्चे का स्कूल ना छूटे।