नई शिक्षा नीति पर राज्यों की सहमति बनाना है चुनौती

 
मानव संसाधन मंत्रालय जल्द से जल्द केबिनेट में लाना चाहता है नीति
राज्यों की सहमति के बिना केबिनेट में लाना होगा मुश्किल
 
नई दिल्ली। नई शिक्षा नीति के मसौदे को लेकर जिस तरह के मतभेद व  विवाद सामने आ रहे हैं उसे देखते हुए मानव संसाधन मंत्रालय के सामने नई शिक्षा नीति पर सभी राज्यों के बीच सहमति बनाना प्रमुख चुनौती है। मंत्रालय जल्द से जल्द नई शिक्षा नीति को केबिनेट में पास कराकर संसद में पेश करना चाहता है लेकिन राज्यों की सहमति के बिना मंत्रालय के सामने इसे पास करना अत्यंत मुश्किल होगा यही कारण है कि मंत्रालय ने अभी से राज्यों के बीच सहमति के प्रयास शुरु कर दिये हैं। 
नई शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिये गठित शिक्षाविद डा.के.कस्तुरीरंगन कमेटी ने पिछले शुक्रवार को अपनी रिपोर्ट केन्द्रीय मानव  संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक  को  सौंप दी थी। इस रिपोर्ट पर पहले दिन से ही दक्षिण भारतीय राज्यों ने रिपोर्ट में त्रिभाषा फामरूले को लेकर केन्द्र सरकार को आंखे दिखानी शुरु कर दी थी नतीजतन सरकार को अगले दो दिन में ही नई शिक्षा नीति के मसौदे में परिवर्तन कर त्रिभाषा फामरूले को मसौदे से हटाना पड़ा था। हालांकि त्रिभाषा फामरूले को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों का विरोध अब थम गया है लेकिन सूत्रों का कहना है कि रिपोर्ट तैयार करने वाली कमेटी के कुछ सदस्य रिपोर्ट में परिवर्तन से खुश नहीं  हैं। 
नई शिक्षा नीति के  मसौदे में अन्य अनेक मुददे भी ऐसे हैं जिन पर राज्यों को एकमत करना मुश्किल होगा। शिक्षा का अधिकार कानून का दायरा भी बढाने की बात नई शिक्षा नीति के मसौदे में है। शिक्षा का अधिकार कानून के मौजूदा दायरे की जो स्थिति है वह किसी से छिपी नहीं है। कई राज्यों के पास पर्याप्त ढांचा तक नहीं है। स्कूली शिक्षा के साथ साथ उच्च शिक्षा व शोध आदि में भी बड़े बदलाव की बात की गई है। अंडर ग्रेज्युट  कोर्स को 3 वर्ष से बढ़ाकर 4 वर्ष करने की बात कमेटी ने की है लेकिन यह स्वैच्छिक आधार पर है ऐसे में यदि देश में अलग अलग विविद्यालयों में अंडर ग्रेज्युट कोर्स की अवधि अलग अलग होगी तो यह विसंगतिपूर्ण होगा और पोस्ट ग्रेज्युट में प्रवेश को लेकर भी समस्या होगी क्योंकि 4 वर्ष का अंडर ग्रेज्युट कोर्स कराने वाले विविद्यालय पोस्ट ग्रेज्युट कोर्स में भी 4 वर्ष के अंडर ग्रेज्युट को प्रवेश देंगे। 
कुल 484 पेज की नई  शिक्षा नीति की रिपोर्ट को अभी शिक्षाविद् भी खंगाल रहे हैं। प्राइवेट स्कूलों की ओर से विरोध के स्वर आने लगे हैं। हालांकि सरकार ने रिपोर्ट पर आम जनता से राय   मांगी है और राज्यों के बीच   भी सहमति बनाने के प्रयास शुरु कर दिये हैं। सभी राज्यों को जहां रिपोर्ट भेजी गई है वहीं 22 जून को सभी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों की बैठक भी बुलाई गई है जिसमें मंत्रालय रिपोर्ट के प्रमुख हिस्सों को शिक्षा मंत्रियों के समक्ष रखेगा। मंत्रालय  सूत्रों के अनुसार मंत्री स्तरीय पहली बैठक के बाद यदि आवश्यकता  पड़ी तो पुन: बैठक बुलाई जायेगी। मंत्रालय सूत्रों के अनुसार अगले दो माह में आम सहमति बनाकर रिपोर्ट को केबिनेट के समक्ष पेश किया जायेगा और केबिनेट की मंजूरी के बाद यह रिपोर्ट संसद में पेश की जायेगी।