बाला सरस्वती की जन्मशती पर संस्कृति संवाद श्रंखला

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने सुप्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना तंजावुर बाला सरस्वती के जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय “संस्कृति संवाद श्रृंखला” का आयोजन किया। दो दिन तक चले इस आयोजन के पहले दिन एक परिचर्चा का आयोजन किया गया, उसके बाद बाला सरस्वती की शिष्य नंदिनी रमणी व उनके शिष्यों ने 'पाद मंजरी' के माध्यम से बाला सरस्वती को नृत्यांजली दी ।

परिचर्चा सत्र में डॉ सोनल मानसिंह, डॉ सरोजा वैद्यनाथन, पंडित बिरजू महाराज, डॉ पद्मा सुब्रमण्यम, केंद्र के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय व सदस्य सचिव डॉ सच्चिदानंद जोशी ने भाग लिया। इस सत्र का संचालन केंद्र के सदस्य सचिव डॉ सच्चिदानंद जोशी ने किया। सत्र का शुभारंभ करते हुए डॉ जोशी ने कहा कि “केंद्र ने राय साहब की प्रेरणा से देश के उन सांस्कृतिक मनीषियों पर संस्कृति संवाद शृंखला का आयोजन कर रही है जिनका भारत की सांस्कृतिक विरासत में महत्वपूर्ण योगदान रहा है और निसंदेह बाला सरस्वती जी भारतीय कला व संस्कृति की राजदूत थी। उनके जनशती के अवसर पर आईजीएनसीए संस्कृति संवाद शृंखला के 12वी कड़ी का आयोजन कर रही है। ये बाला जी का ही प्रभाव है कि आज इस मंच पर देश के ख्यात नृत्य मूर्तियाँ विराजमान हैं।”

इस कार्यक्रम कि सूत्रधार डॉ सोनल मानसिंह ने परिचर्चा में भाग लेते हुए कहा कि “बाला जी के जैसे न कोई था न कोई होगा, वो बियॉन्ड द ब्यूटीफुल थी, वह दुनिया की तीन सबसे प्रसिद्ध नृत्यांगनाओं में से एक थी। आज हमें ये सोचने की जरूरत है कि उन्होनें अपने कृतियों से हमे क्या-क्या दिया है।”

डॉ सरोजा वैद्यनाथन ने बाला जी के साथ जुड़े अपने संस्मरणों को साझा करते हुए कहा कि बाला अम्मा मेरे नृत्य के क्षेत्र में कुछ करने की  प्रेरणा का स्रोत थी, मेरी फैमिली भले ही नृत्य को देखना पसंद करती थी लेकिन वो नही चाहते थे कि मैं इस फील्ड में जाऊं। लेकिन जब मैंने बाला जी को देखा तो मैने उनके जैसे बनने की सोच ली। डॉ पद्मा सुब्रमण्यम ने बाला जी के बारे में बताते हुए कहा कि वो केवल नृत्यांगना नही थी वो अभिनय सरस्वती , संगीत सरस्वती थी। वो एक विशाल पेड थी।

विश्व प्रसिद्ध कथक गुरु पंडित बिरजू महाराज ने बाला सरस्वती के साथ अपने पूर्व संस्मरण को साझा करते हुए कहा कि वो अद्भुत कलाकार थी, उनके अंदर एक सच्चाई थी, बहुत कम ही कलाकारों में यह देखने को मिलती है, उनसे जुड़ी यादें कभी पुरानी नही हो सकती, वो आज भी ताज़ा हैं। 

कार्यक्रम के दूसरे दिन बाला सरस्वती के जीवन पर भारत के प्रसिद्ध फ़िल्मकार सत्यजित रे द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘बाला’ का प्रदर्शन किया गया। उनके जीवन पर आधारित यह एक मात्र फ़िल्म है। इसके बाद नंदिनी रमणी ने ‘द डांस लेगेसी ऑफ बाला’ सत्र में अपने शिष्यों के साथ बाला जी द्वारा कंपोस्ड खास नृत्य शैलियों का प्रदर्शन किया। बाला सरस्वती पर केन्द्रित इस दो दिवसीय संस्कृति संवाद शृंखला का समापन ‘बाला-द कोंसुम्मेट म्यूजीशियन’ सत्र से हुआ जिसमें दक्षिण भारतीय शैली कि प्रसिद्ध संगीतज्ञ चारुमति रामचंद्रन ने बाला के संगीत की खासियतों के बारे में बताया।