खेल खेल में बच्चों की शरारत को मिल रही दिशा

 

  • आईएनजीसीए व उड़ान-द सेंटर आफ थियेटर आर्ट एंड चाइल्ड डवलपमेंट के बाल रंगमंच शिविर में बच्चे कर रहे मस्ती
 
नई दिल्ली। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला संस्थान संस्कृति मंत्रालय तथा उड़ान-द सेंटर आफ थियेटर आर्ट एण्ड चाइल्ड डवलपमेंट द्वारा आयोजित बाल रंगमंच प्रशिक्षिण शिविरों में खेल खेल में बच्चों की प्रतिभा को नई उडान मिल रही है। इन शिविरों में बच्चों की शरारत को जहां नई दिशा मिल रही है वहीं अपनी मौलिक प्रतिभा को निखारने के साथ साथ बच्चे जीवन में आगे बढने के गुर सीख रहे हैं। 
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला संस्थान संस्कृति मंत्रालय तथा उड़ान-द सेंटर आफ थियेटर आर्ट एण्ड चाइल्ड डवलपमेंट द्वारा रोहिणी स्थित माउंट आबू पब्लिक स्कूल तथा मदर डिवाइन पब्लिक स्कूल में आयोजित बाल रंगमंच प्रषिक्षण शिविरों में बच्चों को रंगमंच की विभिन्न विधाओं का तो प्रशिक्षण दिया ही जा रहा है साथ ही बच्चे के जीवन को दिशा दिये जाने की कोशिश की जा रही है। अपनी तरह के इन अनूठे शिविरों की विशेषता यह है कि बच्चों का प्रशिक्षण उनके खेल व शरारतों से जुडा है, बच्चों की शरारतों को ही उनकी प्रतिभा बनाने की इस पहल मंन बच्चे खूब मस्ती कर रहे हैं। प्रशि्क्षण के तहत विभिन्न विभागों के कई सरकारी अधिकारी तथा गणमान्य व्यक्ति शिविर में पहुंच कर बच्चों से सीधा संवाद कराया जा रहा जिससे बच्चों की विचारशक्ति में जहां परिवर्तन होने के साथ साथ उनकी कल्पनाशक्ति भी बढ रही है। इन शिविरों में अलग अलग स्कूलों के लगभग 100 बच्चे हैं।
शिविर में भाग ले रही नवीं कक्षा की मितिशा, 7वीं के सात्विक, हिमांशी व जलज कहना है कि इस शिविर में आकर उनका आत्मविश्वास बढा है। अशोकक विहार निवसी अंजल व हार्दिका के अलावा पटेल नगर निवासी गुंतास, दित्या व धृति  ने बताया कि उन्हें शि्विर में आकर बहुत मजा आता है और रोजाना कुछ ना कुछ नया करने का अनुभव मिलता है। पार्थ, अतिश्य,निश्चय, गुरदीप, प्रीत, ताशु, नेत्रा, दीक्षा, शगुन व राहिनी का कहना था कि वह इस शि्विर को कभी नहीं भूल पायेंगे क्योंकि यहां मस्ती भी है, नाटक भी है और जीवन में आगे बढने की शिक्षा भी है। 
उडान के निदेशक संजय टुटेजा के अलावा राष्ट्रीय नाटय विद्यालय के स्नातक तथा फिल्म कलाकार राजेश तिवारी तथा प्रमुख रंगकर्मी व निर्देशक तुशार डे इन शिविरों में बच्चों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। निदेशक संजय टुटेजा कहते हैं कि जिन बच्चों को उनकी मौलिक प्रतिभा से बचपन में पहचान करा दी जाती है वह बच्चे बाकी बच्चों की भीड में अलग दिखाई देते हैं, यह शिविर बच्चों को भीड़ से अलग  बनाने का ही एक प्रयास है। उन्होंने बताया कि पिछले 25 वर्ष में लगभग 10 हजार बच्चों को वह प्रशिक्षित कर चुके हैं जिनमें से अनेक बच्चे आज कई महत्वपूर्ण पदों पर हैं।