उत्तरी व दक्षिणी संगीत परंपरा का अनूठा संगम

नई दिल्ली। इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र पिछले कुछ समय से कला क्षेत्र में अनूठे प्रयोग कर रहा है, इस प्रयोग में कल केंद्र ने अपने सभागार में भारतीय शास्त्रीय संगीत परम्परा की दोनों शैलियों के दो वरिष्ठ कलाकार उत्तर भारतीय संगीत परम्परा (हिन्दुस्तानी शैली) के सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पंडित रोनू मजुमदार एवं दक्षिण भारतीय संगीत परम्परा (कर्नाटक शैली) की सुप्रसिद्ध सरस्वती वीणा वादक जयंती कुमारेश का एक मंच पर जुगलबंदी का आयोजन किया | यह आयोजन न केवल इसलिए खास रहा कि दो शैली के कलाकार एक साथ जुगलबंदी कर रहे थे बल्कि इसलिए भी खास रहा कि इस जुगलबंदी का थीम 13 -14 वी शताब्दी से पूर्व के रागों पर आधारित थी, जब भारत में कर्नाटक और हिन्दुस्तानी शैली की जगह केवल भारतीय शास्त्रीय संगीत ही हुआ करता था | 

इस जुगलबंदी की शुरुआत हुई उत्तर-दक्षिण के रागों से जिसमे पंडित रोनू मजुमदार ने अपनी बाँसुरी पर पुरिया एवं सोहनी राग को बजाया जिसमे जुगलबंदी करते हुए जयंती कुमारेश ने सरस्वती वीणा के तार पर राग हंसानंदी की तान छेडी,जिसकी रचना रूपक ताल में निबद्ध थी | इसके बाद  दोनों ने करहरप्रिया, काफी, अलाप, जोड़ा, झाला रागों की प्रस्तुति दी जिनकी रचना आदि ताल एवं तीन ताल में निबद्ध थी | जयंती कुमारेश ने वीणा पर आदि ताल को और रोनू मजुमदार ने बाँसुरी पर तीन ताल प्रस्तुत किया | कार्यक्रम का समापन “श्री राम चन्द्र कृपालु भजमन” भजन के साथ हुआ | इन जुगलबंदी कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध तबलावादक अभिजीत बनर्जी और मृदंगम पर अर्जुन कुमार की जुगलबंदी भी काबिले तारीफ रही |

इस अनूठे आयोजन में सुप्रसिद्ध नृत्यांगना पद्मभूषण डॉ सोनल मानसिंह, इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ सच्चिदान्द जोशी के अलावा भारतीय संगीत के कई विद्वान मौजूद रहे |