शिक्षा के प्रचार के लिये हो सामाजिक भागीदारी 

शिक्षा वरदान और अभिशाप

                       

शिक्षा और इसके महत्व से समाज का कोई भी पहलू अछूता नहीं है, यह तो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मेरा मानना है कि ”शिक्षा समाज के लिए वरदान और अभिशाप दोनों ही है, क्योंकि समाज में जितनी भी अच्छाइयां हैं और जितनी भी बुराइयां हैं उसका एकमात्र कारण केवल और केवल शिक्षा ही है”। 

अगर हम गंभीरता से विचार कर पाएं तो पाएंगे कि अगर शिक्षा का उद्देश्य मानव समाज का निर्माण करना है तो क्या हम जिस समाज में रह रहे हैं, वह संपूर्ण रूप से ऐसा मानव समाज है क्या ? शायद नहीं, हमें इसी उत्तर से संतुष्ट होना पड़ता है और यह अवस्था ही शिक्षा की विकृति है। 

“जो लोग समाज में पूर्ण रूप से जाग्रत हैं उनको वास्तविक शिक्षा प्राप्त हुई है। जो शिक्षा के अर्थ और प्रयोजन को समझते हैं वे तो समाज के लिए वरदान हैं लेकिन जिन लोगों को शिक्षा का वास्तविक अर्थ नहीं मालूम, उसका प्रयोजन नहीं मालूम, उसका उद्देश्य नहीं मालूम वे समाज को अनवरत कष्ट दे रहे हैं, समाज की पीड़ा का कारण बन रहे हैैं, समाज का शोषण कर रहे हैं।” 

“वर्तमान समय मेंं शिक्षा का क्या अर्थ है? जिनको पढ़ना लिखना आ गया वे शिक्षित माने जाते हैं, लेकिन वास्तव में ये शिक्षा है नहीं। शिक्षा वह ज्ञान है जिस ज्ञान के द्वारा जीवन को उत्सव पूर्वक जिया जा सके। उत्सव पूर्वक से हमारा तात्पर्य यह है कि जीवन में निरंतर सुख बना रहे। मानव का हर दिन होली हर रात दीवाली हो।”

हर कर्म का निश्चित फल होता है, निश्चित प्रभाव होता है । अच्छे कर्म करेंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरे कर्म करेंगे तो बुरा फल भी भोगना पड़ेगा। यानी हर व्यक्ति को अपने द्वारा किए हुए कर्मों का फल भोगना ही भोगना है, उससे दुनिया की कोई ताकत नहीं बचा सकती। साथ ही साथ हर कर्म का छुपा हुआ एक निश्चित प्रभाव भी होता है। इसलिए आप जिन लोगों के संपर्क में हैं उनके द्वारा किए हुए अच्छे कर्म से लाभान्वित होना है और बुरे कर्म के प्रभाव से आपको अपनी सुरक्षा करनी है, अपने आप को बचाना है। ये जो इतनी बुराइयां फैल रही हैं उसका सबसे बड़ा कारण है कि जो कुछ अच्छे लोग हैं वे केवल और केवल अपने कर्मों की चिंता कर रहे हैं। लेकिन जिन लोगों के साथ हैं उनके कर्मों को सुधारने का प्रयास नहीं करते, जिसकी वजह से जो आदमी बुरे कर्म कर रहा है उनके प्रभाव से अपना संसार प्रभावित हो रहा है और उनके प्रभाव से समाज में बुराइयां जैसे भ्रष्टाचार, व्यभिचार, अकर्मण्यता आदि और अव्यवस्था फैल रही हैं। तो क्यों न हम कुछ ऐसा सकारात्मक करें कि “धरती स्वर्ग बन जाए, मानव देवता हो जाए धर्म सफल हो जाए और प्रकृति में प्रति क्षण केवल और केवल शुभ ही शुभ हो”। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि हम जिन मानवों के साथ हैं उनके कर्मों का प्रभाव भी उनके दायरे में होता है और उनके दायरे को प्रभावित भी करता है। इसके लिए हर मानव को जागृत होने के साथ जो इनके साथ के लोग हैं उनमें भी जागृति फैलानी पड़ती है।” इसलिए शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी कुछ इसी तरह किया जाना चाहिए, तभी आपकी प्राप्त शिक्षा अर्थवान है अन्यथा नहीं।

देश के महान शिक्षक और राष्ट्रपति महामहिम राधाकृष्णन ने भी अपने विचार रखते हुए कहा था कि “शिक्षा का उद्देश्य मात्र बौद्धिक स्वाधीनता नहीं है, इसका उद्देश्य हृदय और अन्तश्चेतना की मुक्ति है। बाहर से दिखाई देने वाली मलीन बस्तियों की अपेक्षा मानसिक मलीन बस्तियां कहीं अधिक खतरनाक हैं।”
यह सही है कि शिक्षा का उपयोग करने से इंकार करना किसी भी व्यक्ति को एक संपूर्ण इंसान बनने में बाधा पैदा कर सकता है। इसलिए परिवार, समाज और देश को बड़े स्तर पर ले जाने के लिए मानव के हर स्तर पर शिक्षा का महत्व बहुत आवश्यक है। और ऐसा तब तक नहीं हो पाएगा जब तक प्राप्त ज्ञान का हस्तांतरण करने का प्रयास नहीं किया जाएगा। 

दरअसल शिक्षा अपने आप में गतिमान प्रक्रिया है। शिक्षा हमें सिर्फ ज्ञान ही नहीं देता है बल्कि उसके सही उपयोग से हमें सरल और सहज जीवन प्रदान करता है, साथ ही स्वस्थ समाज के निर्माण में मददगार भी साबित होता है। इसलिए दुनिया भर के लोगों के अस्तित्व और जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण यंत्र है। आइए इसके प्रचार प्रसार में हम सब भागीदार बनें।


चंद्रकांत सिंह

डायरेक्टर / चेयरमैन
रेडिएंट पब्लिक स्कूल