गुरुकुलों में गूंज रहे बदलाव के श्लोक, नये जमाने के मुताबिक तैयार होंगे बटुक  
 
            : हषर्वर्धन प्रकाश :
इंदौर। आमतौर पर गुरुकुल का विचार आते ही वन क्षेत्र के किसी दूरस्थ आश्रम में प्राचीन ग्रंथों का सस्वर पाठ करते बटुकों (विद्यार्थियों) का दृश्य मन में उभरता है। लेकिन इस पुरानी छवि को तोड़ने के लिये देश भर के 6,000 से ज्यादा गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं को मौजूदा दौर की जरूरतों के मुताबिक ढालने की कवायद शुरू हो गयी है।
  राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) ने इस दिशा में पहल करते हुए ’भारतीय ज्ञान परम्परा’ पर आधारित छह नये पाठ्यक्रमों को मंजूरी दी है। माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर के ये पाठ्यक्रम आयुव्रेद, योग, वेदपाठ, व्यावहारिक संस्कृत व्याकरण, न्याय शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र जैसे विषयों में विद्यार्थियों को औपचारिक प्रमाणपत्र प्रदान करते हैं।    एनआईओएस के अध्यक्ष चंद्र बी. शर्मा ने ’पीटीआई-भाषा’ को बताया, ’गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं के हजारों विद्यार्थियों को शिक्षा तथा रोजगार की मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से हमारी अकादमिक परिषद ने इन पाठ्यक्रमों को अनुमति दी है।’ 
  शर्मा ने कहा, ’देश के अधिकांश गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं में शिक्षा पूरी करने के बाद विद्यार्थियों को इसका कोई औपचारिक प्रमाणपत्र नहीं दिया जाता है। इस कारण वे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरियों के लिये भी आवेदन नहीं कर पाते हैं। हम अपने नये पाठ्यक्रमों के जरिये इस स्थिति को बदलना चाहते हैं।’  उन्होंने कहा कि गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं के विद्यार्थी हालांकि स्कूली शिक्षा के औपचारिक प्रमाण पत्र के लिये मुक्त विद्यालयों का रुख करते रहे हैं। लेकिन छह नये पाठ्यक्रमों को एनआईओएस की मंजूरी से पहले उन्हें ये प्रमाणपत्र हासिल करने के लिये उन विषयों की परीक्षा पास करनी पड़ती थी, जिनका गुरुकुल में पढ़ाये जाने वाले पारम्परिक विषयों से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता था। गुरुकुलों की शिक्षा पद्धति को आज के जमाने की आवश्यकताओं के अनुसार बनाने के लिये कुछ गैर सरकारी संगठन भी अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं।  इन संगठनों में शामिल भारतीय शिक्षण मंडल के संगठन मंत्री मुकुल कानिटकर सुझाते हैं, ’राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (नैक) की तर्ज पर ऐसी शीर्ष संस्था बनायी जानी चाहिये, जो देश भर के गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं का पंजीयन करे। फिर संबंधित विषयों के विद्वान इन पारम्परिक शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता का परीक्षण करें। इस जांच के आधार पर इन संस्थानों को प्रमाणपत्र दिये जायें।’
    उन्होंने हालांकि कहा कि गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं की शिक्षा पद्धति के मानकीकरण की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इन पारम्परिक शिक्षा संस्थानों की विविधता को सहेजना भी बेहद जरूरी है।  कानिटकर ने कहा, ’हम चाहते हैं कि देश भर के गुरुकुलों को इस तरह विकसित किया जाये कि वहां वेदों और प्राचीन शास्त्रों के पारम्परिक शिक्षण समेत कला, विज्ञान, गणित और अन्य समकालीन संकायों के विषयों की भी पढ़ाई हो सके। इसके साथ ही, विद्यार्थियों को योग, कौशल विकास, आत्मरक्षा, कृषि, गो पालन और स्वावलम्बन के गुर भी सिखाये जा सकें।’ 
  बहरहाल, गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं को नये जमाने की करवटों के मुताबिक विकसित करने की राह में मुश्किलें कम नहीं हैं। कानिटकर ने कहा, ’इस सिलसिले में सबसे पहली चुनौती ऐसे सुयोग्य आचार्य तैयार करने की है जो अलग-अलग विषयों के ज्ञाता हों। इसके साथ ही, उनमें शिक्षा संस्थानों के सुचारू प्रशासन और प्रबंधन की भी क्षमता हो। हमने अगले पांच वर्षों में देश भर में ऐसे 500 आचार्य तैयार करने का लक्ष्य तय किया है।’ 
साभार भाषा