विश्व का मंगल करने के लिये संवाद जरूरी : बाबा योगेन्द्र
 

नई दिल्ली। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की ओर से संस्कृति संवाद श्रृंखला-8 का आयोजन किया गया। शनिवार 21अप्रैल को आयोजित संवाद श्रृंखला में कलाऋषि बाबा योगेन्द्र पर केंद्रित थी। कला केंद्र के मुख्य सभागार में आयोजित समारोह का उद्घाटन गोवा की राज्यपाल माननीय मृदुला सिन्हा ने किया। इस अवसर पर उन्होंने बाबा योगेन्द्र को शाॅल, श्रीफल, वाग्देवी की मूर्ति और शाॅल भेंटकर सम्मानित किया। 
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा मौजूद थीं। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि आज के समय का तकाजा है कि सांस्कृतिक आयोजन हों। हम अपने व्यवहार से ही आने वाली पीढ़ी को संस्कारित कर सकते हैं। इतिहास में, संस्कार में, संस्कृति में अगर हमें ह्रास होता दीखता है तो जिसे आम लोग महसूस नहीं कर पाते हैं। पर जो लोग महसूस करते है, वो उसे दोगुणे वेग से पुर्नस्थापित करने के प्रयास में जुट जाते हैं। बाबा योगेन्द्र ऐसे ही स्वतः स्फूर्त व्यक्तित्व हैं। उन्होंने मिट्टी का रंग और सुगंध देखकर कला का पुष्ट बीज डाल दिया है, लोगों में। जो समय के साथ नित नए विकास की सीमा तय करेगा। उन्होंने समाज से थोड़ा लिया है, और उसे कई गुणा बढ़ा कर समाज और देश को दिया है। 


सदस्य सचिव डाॅ सच्चिदानंद जोशी ने स्वागत भाषण में कहा कि हमारे संस्कृति और हमारे समाज में संवाद की चिरंतन परंपरा रही है। संवाद के जरिए हम जीवन की श्रेष्ठता, कल्पनाशीलता, आत्मीयता, सृजनशीलता को प्राप्त करते हैं, जिसके एक पर्याय हैं, संस्कृति पुरूष-बाबा योगेन्द्र। संस्कार भारती के संस्थापक सदस्य बाबा योगेन्द्र ने कहा कि समाज, देश, परिवार और विश्व का मंगल करने के लिए हर स्तर पर संवाद जरूरी है। सांसद व गायक मनोज तिवारी ने कहा कि जब मैं बनारस हिंदु विश्वविद्यालय में पढ रहा था, उस दौरान मुझे सबसे पहले संस्कार भारती के मंच पर ही गाने का अवसर मिला।
उद्घाटन सत्र के दौरान युवा गायिका अदिति शर्मा ने सरस्वती वंदना और कृष्ण भजन गाया। इसके अलावा, बाबा योगेन्द्र पर केंद्रित किताब ‘कला साधना के वटवृक्ष‘ का लोकार्पण राज्यपाल मृदुला सिन्हा, बाबा योगेन्द्र, उस्ताद वसीफुद्दीन डागर, मालिनी अवस्थी, मनोज तिवारी, माधव भान ने किया गया। इसका संपादन व संकलन पत्रकार शशिप्रभा तिवारी ने किया है। 

संस्कृति संवाद श्रृंखला में चर्चा के तहत बाबा योगेन्द्र-जीवन एवं योगदान, भारतीय कला दृष्टि और कला साधना-साधक एवं संस्था पर कलाकारों और विद्वान जनों ने चर्चा की। प्रथम सत्र बाबा योगेन्द्र-जीवन एवं योगदान का संचालन मीडिया कर्मी अतुल जैन ने किया। इस अवसर पर सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य में चित्रकार श्याम शर्मा ने कहा कि मुझे काम करते-करते संस्कार भारती के काम का पता चला। वहीं संस्कार भारती की कार्यकर्Ÿाा माधवी ताई कुलकर्णी ने कहा कि जब हमें उदासीनता होती है या निराशा होती है तब हम बाबाजी के सानिध्य में जाते हैं। जबकि, उदय इंदुरकर ने कहा कि हमारे भारतीय चिंतकों ने विज्ञान के खोज से पहले ही अपने चिंतन-मनन से जगत के सत्य को स्थूल व सूक्ष्म रूप में प्रमाणित कर दिया था। इसी श्रृंखला के चिंतक बाबा योगेन्द्र हैं। इस सत्र में लोकगायिका मालिनी अवस्थी ने कहा बाबा योगेन्द्र सांस्कृतिक जागरण के भागीरथ हैं। 
तीसरे सत्र में भरतनाट्यम नृत्यांगना सरोजा वैद्यनाथन, धु्रपद गायक उस्ताद वसीफद्दीन डागर, कथक नृत्यांगना नलिनी, बांसुरीवादक चेतन जोशी और चित्रकार हीरालाल प्रजापति ने शिरकत की। भारतीय कला दृष्टि के संदर्भ में अपने विचार रखते हुए, उस्ताद वसीफुद्दीन डागर ने कहा कि संस्कृति के संरक्षण से ही संस्कारों का संरक्षण हो सकता है। इसके लिए मीडिया का सहयोग प्राप्त करना हमारे लिए जरूरी है। चित्रकार हीरालाल प्रजापति ने कहा कि कलाकारों को जोड़ना सबसे ज्यादा जरूरी है, जैसा कि बाबाजी ने किया। जबकि, चेतन जोशी ने कहा कि हम भारतीय कलाकार अपनी कला साधना से सत्यं शिवम् सुंदरम की स्थापना करने की कोशिश करते हैं। कथक नृत्यांगना नलिनी ने कहा कि हमारे लिए कला और कला साधना ही जीवन है। यही दृष्टि है और यही दृष्टिकोण भी है। 
कला साधना, साधक और संस्था विषय पर डाॅ दयाप्रकाश सिन्हा, टी एस नागभरना, अमीर चंद, गजेन्द्र सोलंकी और डाॅ स्वर्ण अनिल ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए। इस सत्र का समापन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय के वक्तव्य से हुआ। जबकि, संस्कृृति संवाद श्रृंखला-8 का समापन बाबा योगेन्द्र जी के जीवन पर आधारित वृत चित्र के प्रदर्शन से हुआ। इसका निर्देशन अतुल जैन ने किया था। इस श्रृंखला का संचालन राहुल चैधरी नील ने किया।