राजनीति के अखाड़े में 'द लॉ' 

नवीन पाल

गुजरात विधानसभा में 14 मार्च को बजट सत्र के दौरान हुई एक शर्मनाक हरकत ने पूरे देश का ध्यान खींचा। कांग्रेस और बीजेपी के विधायकों में जमकर हाथापाई हुई। कांग्रेस विधायक प्रताप दुधार्क ने बीजेपी के जगदीश पंचाल को सदन में थप्पड़ मार दिया। इसके जवाब में बीजेपी के विधायकों ने कांग्रेस के विधायक अमरीष डेर की पिटाई कर दी। दरअसल सदन के भीतर रेप आरोपी आसाराम पर चर्चा हो रही थी। इसी दौरान कांग्रेस विधायक इस पर सत्तापक्ष से अतिरिक्त सवाल पूछना चाह रहे थे लेकिन बीजेपी विधायकों ने इसका विरोध किया। इस बीच प्रश्नकाल समाप्त हो गया तो कांग्रेस विधायक आपा खो बैठे और उन्होंने माइक तोड़ बीजेपी विधायक पर हमला कर दिया। जिसने भी इसे देखा वह स्तब्ध रह गया।  

इस वाक्ये ने 14 अगस्त 2002 को यूपी विधानसभा की घटना याद दिला दी जिसमें समाजवादी पार्टी के विधायकों ने माइक से बीजेपी विधायकों पर हमला कर दिया था। उस दिन सदन में समाजवादी पार्टी के विधायक बाबरी मस्जिद मामले में लाल कृष्ण आडवाणी की भूमिका को लेकर चर्चा की मांग कर रहे थे। विधानसभा स्पीकर केशरी नाथ त्रिपाठी ने जब इससे इनकार कर दिया तो सपा विधायकों ने सीटों के सामने लगे माइकों को तोडकर फेंकना शुरू कर दिया जिसके बाद दोनों ओर से जमकर माइक चले। उस समय ये तस्वीर दुनिया भर की मीडिया की सुर्खियां बनी थी। इस दौरान दोनों और कई विधायकों को गंभीर चोटें आईं। इस दिन की तस्वीरें यूपी विधानसभा के काले इतिहास में शामिल हैं। 


अब जरा महान फ्रांसीसी अर्थशास्त्री और पत्रकार फेडरिक बास्तियात की सन 1850 में फ्रेंच भाषा में लिखी किताब ‘द लॉ’  के हिन्दी संस्करण पेज नंबर 21 पर नजर डालिये। फेडरिक बास्तियात लिखते हैं कि “विधानसभा भवन ( लेजिस्लेटिव पैलेस) के द्वार पर लोग सदैव गुत्मगुत्थी करते हैं। ये संघर्ष अंदर भी कम नहीं होगा। इस बात के प्रति आश्वस्त होने के लिए ये देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि चैम्बर्स में क्या चलता है, लेकिन प्रश्न कैसे खड़ा होता है इसे जानने के लिए ये पर्याप्त है।

बास्तियात लिखते हैं कि “चूंकि सभी लोग अपने स्वयं के हित में कानून का गलत उपयोग करते हें इसलिए हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। हमें इसकी सहायता से सहयोग प्राप्त करने का अधिकार बनाना चाहिए। इसे अमल में लाने के लिए हमें निर्वाचक और विधायक बनना ही होगा ताकि हम बड़े पैमाने पर संगठित हो सकें और अपने स्वयं के  वर्ग के लिए दान दे सकें, ठीक वैसे ही जैसे आप अपनी सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर संगठित हैं। हमें ये मत कहिये कि हमारे मसले का हल आप ही ढूंढ लेंगे।“

कहने का लब्बोलुआव ये है कि बास्तियात जानते थे कि इस तरह की धींमामुश्ती का असल मकसद लोगों का ध्यान बांटना है। सदन में इस तरह की घटनाएं असल मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए होती हैं इसलिए उनका मानना था कि स्थानीय लोगों को भी राजनीति में आना चाहिए ताकि एक वर्ग विशेष अपने स्वार्थ के लिए कानूनों के जरिये दूसरे का शोषण ना करे।

बास्तियात की इस बात को हाल में यूपी में हुए गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव की तस्वीर से भी समझा जा सकता है। इस चुनाव में बरसों से एक दूसरे की जानी दुश्मन रही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी गलबहियां डाल चुनाव मैदान में उतरी और बीजेपी उम्मीदवारों को धूल चटा दी। अब ये दोस्ती अगले साल होने वाले संसदीय चुनाव में बीजेपी को परेशानी में डाल सकती है।

इस दोस्ती से पहले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे। दोनों पार्टियों की दुश्मनी की नींव पड़ी दो जून 1995 को जब यूपी की मुलायम सिंह यादव सरकार से मायावती ने समर्थन वापस ले लिया। इससे बौखलाए समाजवादी पार्टी समर्थकों ने मायावती को लखनऊ के गेस्ट हाउस में घेर लिया और मारने की कोशिश की। किसी तरह बीजेपी विधायकों ने मायावती को बचाया तब से समाजवादी पार्टी और बसपा की तनातनी चली आ रही है। पर अब जमाना इन दोनों पार्टियों की दोस्ती देखेगा। बीच में अगर कोई उल्लू बना तो वो जनता थी या फिर पार्टी कार्यकर्ता।

‘द लॉ में बास्तियात कहते हैं कि राजनीतिज्ञों को समाज को आकार देने के लिए बल की आवश्यकता पड़ती है। ये लोगों को बड़ी ही चतुराई से भाई चारा, एकता, संगठन और संघ आदि मोहक नाम पर भटकाते हैं यहां तक कि वो खुद को भी गलतफहमी में डाले रखते हैं।

बास्तियात समस्त मानव जाति को दो भागों में बांटते हैं। एक (राजनीतिज्ञों को छोड़कर) सभी साधारण मनुष्य, दूसरे वो जिनको राजनेता स्वयं बनाते हैं। दूसरे प्रकार के लोग जिन्हें राजनेता स्वयं बनाते हैं। ये औरों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। वास्तव में यह मानकर चलते हैं कि मनुष्य किसी भी क्रिया के सिद्धांत से रहित है और उसमें कोई विवेक नहीं है। वे स्वयं से कोई काम नहीं कर सकते हैं। वे एक निष्क्रिय पदार्थ, अप्रतिरोधी कण, बिना आवेगों वाला परमाणु हैं और अपने अस्तित्व से उदासीन किसी वनस्पति से अधिक कुछ भी नहीं है। उन्हें संभालने के लिए दूसरे लोगों के दिमाग और हाथों की आवश्यकता होती है जो कि थोड़े बहुत सुडौल, कलात्मक और सिद्ध जैसे अनगिनत स्वरूप में हो सकते हैं।

बास्तियात ने राजनीति के स्वरूप को लेकर सटीक टिप्पणियां की हैं। ‘द लॉ’ में वो लिखते हैं कि सभी राजनेता बेहिचक स्वयं को संगठनकर्ता, खोजकर्ता, कानून निर्माता, संस्थापक अथवा प्रतिस्थापक, इच्छा शक्ति व हाथ, सार्वभौमिक पहल, सृजन शक्ति मानते हैं जिनका परम उद्देश्य उक्त मस्त बिखरी पड़ी सामग्री यानी मनुष्य को समाज में इकठ्ठा करना है।   

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के आकाओं ने अब बिखरे पड़े अपने कार्यकर्ताओं को इकठ्ठा कर लिया है। दो सीटों पर जीत के बाद आला नेताओं में उमंग है और कार्यकर्ता भी जोश में है लेकिन उन कार्यकर्ताओं को याद करने वाला कोई नहीं जो दोनों पार्टियों की चली आ रही बरसों पुरानी दुश्मनी में एक दूसरे पर हमला कर जान गंवा बैठे। समाजवादी पार्टी नेता और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सही ही कहते हैं कि राजनीति में पुरानी बातों को भूलना पड़ता है। फिर जब मौका रोटियां सेंकने का है तो फिर भला इंतजार क्यूं किया जाए। अगर आज फ्रेडरिक बास्तियात जिंदा होते तो इन घटनाओं को देख मुस्कुरा रहे होते और फिर ‘द लॉ’ को इन जीवंत उदाहरणों के साथ लिखते।
 (लेखक, वरीष्ठ टीवी पत्रकार हैं)