देश में शोध कार्यो का राजनीतिकरण हुआ: बी. बी कुमार

नयी दिल्ली। प्रसिद्ध समाज विज्ञानी एवं भारतीय समाज विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर)  के अध्यक्ष डॉ बी बी कुमार ने देश की समस्यायों को सुलझाने वाले विषयों पर मौलिक शोध कार्यो पर जोर देते हुए कहा है कि समाज विज्ञान के क्षेत्र में अनुसन्धान कार्यो का भी राजनीतिकरण हुआ है इसलिए समाज को तोड़ने की बजाय जोड़ने वाले विषयों पर काम होना चाहिए।
बिहार के बक्सर जिले के डुमरी गांव मे जन्में डॉ. कुमार ने यूनीवार्ता के साथ एक विशेष भेंटवार्ता में कहा कि देश में शोध एवं अनुसंधान कार्यो का भी राजनीतिकीकरण हुआ है और एक ही विषय पर बार-बार शोध से दुहराव हुआ है। शोधकार्य ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे समाज में बंटवारा हो बल्कि समाज को जोड़ने का काम होना चाहिए,  इसलिए आज मौलिक शोध कार्य करने की अधिक जरूरत है। 
श्री कुमार ने कहा कि शोध कार्य केवल करियर के लिए नहीं बल्कि देश की समस्याओं और चुनौतियों को सुलझाने के लिए होना चाहिए। शोधार्थियों को यह सोचना चाहिए कि वे अपने अनुसन्धान कार्यो से समाज को कुछ दें।
उन्होंने भारतीय चिंतन परंपरा की चर्चा करते हुए बताया कि वह संत रविदास और आनंद कुमार स्वामी जैसे भारतीय मनीषियों पर नई राष्ट्रीय फ़ेलोशिप शुरू करेंगे।  उन्होंने कहा कि अतीत में हमारे मनीषियों ने हर क्षेत्र में बहुत कार्य किया है जिसकी आज लोगों को जानकारी नहीं है, इसलिए ऐसे लोगों की स्मृति में नए फ़ेलोशिप शुरू करने की जरुरत है।
प्रसिद्ध अर्थशासी एवं दलित चिंतक सुखदेव थोराट का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अध्यक्ष बने डॉ. कुमार ने कहा कि वह इस संस्थान में पहले से चली आ रही गड़बड़ियों को ठीक करने में लगे है तथा नियमों का उल्लंघन कर दी गई शोध परियोजनाओं की जांच करवा रहे है।
उन्होंने कहा कि कई लोगों ने लाखों रुपये की शोध परियोजनाएं लीं पर आज तक अपना काम पूरा नहीं किया है इसलिए विभागीय जांच के लिए एक कमेटी गठित की गयी है। धर्म भाषा संस्कृति से जुड़े विषयों पर कई ग्रंथ लिखनेवाले डॉ. कुमार ने कहा कि इस समय इस संस्थान में 50 प्रतिशत से अधिक पद रिक्त पड़े है और वह इस संस्थान को दुरुस्त करने के लिए इन पदों को भरने का काम कर रहे हैं  ।                                    
देश के पूर्वोत्तर राज्यों में वर्षों तक आदिवासी जीवन का अध्ययन करने वाले डॉ. कुमार ने कहा कि आईसीएसएसआर देश के 24 संस्थानों की फंडिंग करता है और सरकार से उसे 250 करोड़ रुपये का ही अनुदान मिलता है जबकि नैयर समिति ने दो हजार करोड़ रुपये देने की सिफारिश की थी। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस मामले में ढील नहीं बरती बल्कि यह हमारी ढिलाई रही कि हम इस मामले को पुरजोर ढंग से आगे नही बढ़ा सकेंत्र           
उन्होंने बताया कि संस्थान में 208 पद है जिनमे से करीब 50 प्रतिशत खाली पड़े हैं। इन पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू हो गई हैं। निदेशक के छह पद है पर आज केवल एक निदेशक है।                         
चौंसठ आदिवासी भाषाओं का कोष संपादित करने वाले इस शिक्षा शासी ने यह भी कहा कि उनसे पहले इस संस्थान में कई तरह की गड़बड़ियां हुई हैं जिन्हें दूर करने का काम वह कर रहे हैं और इस संस्थान को पटरी पर लेने की कोशिश कर रहे हैं। श्री कुमार को जब गत वर्ष नियुक्त किया गया था तो कांग्रेसी बुद्धिजीवियों ने कड़ी आपत्ति जतायी की थी और उन्हें   दक्षिणपंथी रुझानों वाला विद्वान करार दिया था।