डीबीटी के जरिए छात्रवृत्ति के भुगतान का अपेक्षित परिणाम नहीं 

     (अनवारूल हक) 
          नयी दिल्ली। संसद की एक समिति ने कहा है कि जनजातीय विद्यार्थियों को लाभ के प्रत्यक्ष अंतरण (डीबीटी) योजना के तहत छात्रवृत्ति के भुगतान के कदम का अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहा है क्योंकि उनको बैंक खाते खोलने में परेशानी हो रही है।
           सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से संबद्ध संसद की स्थायी समिति ने  जनजातियों के लिए शैक्षिक योजनाएं  विषय पर रिपोर्ट में सरकार को सुझाव दिया है कि जनजातीय विद्यार्थियों के खाते खोलने में आसानी पैदा करने के लिए बैंकों को निर्देश जारी किया जाए। यह रिपोर्ट गत दिनों संसद में पेश की गई। 
          भाजपा सांसद रमेश बैस की अध्यक्षता वाली इस समिति ने कहा कि डीबीटी योजना छात्रवृत्ति के भुगतान की पक्रिया को दुरस्त करने के लिए लागू की गई है। यह पाया गया है कि डीबीटी के माध्यम से छात्रवृत्ति के भुगतान के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहा है क्योंकि विद्यार्थियों के खाते खोलने में बैंक आसानी से तैयार नहीं होते।  
          उसने कहा कि मंत्रालय इस पर विचार करे और अगर जरूरी हो तो इस मामने को वित्त मंत्रालय के समक्ष उठाए ताकि वह बैंको को निर्देश दे सके।  जनजातीय कार्य मंत्रालय की तरफ से नौवीं और 10वीं कक्षा में अध्ययनरत जनजातीय विद्यार्थियों के लिए प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना एक जुलाई, 2012 से क्रि यान्वित की जा रही है। इस योजना के तहत आवासीय विद्यार्थियों को 350 रपये प्रतिमाह और दूसरे विद्यार्थियों को 150 रपये प्रतिमाह दिए जाते हैं।
          मंत्रालय ने समिति को सूचित किया है कि छात्रवृत्ति को 525 रपये और 225 रपये प्रतिमाह करने की सिफारिश की गई है और इस समय यह सक्षम प्राधिकार के समक्ष विचाराधीन है। समिति ने सुझाव दिया है कि अगर मंत्रालय गरीब छात्रों के साथ न्याय करना चाहता है तो छात्रवृत्ति की राशि में वृद्धि की जानी चाहिए।
          संसद की इस स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा,   यह बताया गया है कि कुछ बैंक विद्यार्थियों के खातों में न्यूनतम शेष राशि बनाए रखने के लिए छात्रवृत्ति में से कुछ पैसे काट लेते हैं। समिति बैंक अधिकारियों की तरफ से किए जा रहे ऐसे कृत्य की निंदा करती है। जनजातीय कार्य मंत्रालय इस मामले को वित्त मंत्रालय के साथ उच्च स्तर पर उठाए ताकि बैंक अधिकारियों को निर्देश दिया जा सके कि वे विद्यार्थियों को न्यूनतम शेष राशि रखने के लिए बाध्य नहीं करें।    
साभार भाषा